Dec 20, 2019

यह देश तुम्हारी ज़ागीर नहीं, आग लगाना है तो अपने    
            आशियाने में लगाओ 'देश में नहीं'

देश की संसद में नागरिकता संशोधन बिल पास होने के बाद से लगातार इसका विरोध हो रहा है। तमाम राजनीतिक दलों के साथ-साथ विशेष समुदाय इसका विरोध बहुत ही हिंसक तरीके से कर रहे हैं। सड़कों पर जली हुई बसें, आग में स्वाहा हुईं बाइकें गवाह हैं उस मंज़र का जिसमें देश की शांति और सुव्यवस्था को स्वाहा करते हुए अशांति, हिंसा और नफ़रत फैलाने की कोशिश की गई। बिल के पास होने के बाद से बिना सिर पांव के अफ़वाह फैलाई गई कि ये बिल देश के मुसलमानों के लिए सही नहीं है और उनकी नागरिकता पर ख़तरा है। जबकि संसद में सरकार ने बिल को लेकर सभी तरीके के द्वंद को पहले ही स्पष्ट कर दिया था। बावजूद इसके सोशल मीडिया पर इसे मोदी बनाम मुसलमान की तर्ज़ पर खूब शेयर किया गया। कुछ ने इसे सरकार की जीत के तौर पर आंका तो कईयों ने मुसलमानों की हार के तौर पर भी इसे देखा।

यह दुर्भाग्य है कि इसे लेकर देश में कोहराम मचाया गया। जिसमें देश के उन युवाओं ने हिस्सा लेते हुए हिंसक प्रदर्शन किया जिन्हें देश के भविष्य के रूप में देखा जाता है। देश में कई लोगों ने इसे आंदोलन का नाम तक दिया। साथ ही इसे व्यक्तिगत जीत हार के तौर पर भी देखा। यही वज़ह रही कि दिल्ली समेत कई जगहों पर खूब हिंसा हुई। जिसमें उपद्रियों के साथ-साथ कई पुलिसकर्मियों को चोट आई। साथ ही इसी हिंसा की आग में कई घरों के चिराग़ भी बुझ गये। कुल मिलाकर क़ानून के बहाने सरकार को निशाना बनाते हुए देश में खूब अशांति फैलाने की कोशिश की गयी। साथ ही देश की अथाह संपत्ति को नफ़रत की आग में झोंक कर स्वाहा कर दिया गया।

ये घटनायें सिर्फ़ घटनायें मात्र नहीं हैं जो आज घटित हुईं और कल ठीक हो जाएंगी। गौर करने वाली बात है कि बीते दिनों में जब भी कोई बड़ी घटना हुई है तब लोगों के द्वारा इसी तरह से देश की संपत्ति को आग के हवाले किया गया है। जिस तरह से चंद लम्हों में सरकारी संपत्ति को स्वाहा करने के बाद इन लोगों के चेहरे पर आज तनिक अफ़सोस दिखाई नहीं दे रहा है ये बताता है कि आज देश किस धारा पर आगे बढ़ रहा है।  सवाल उठता है कि क्या इनके सोचने समझने की शक्ति बिल्कुल ही क्षीण हो चुकी है?
किसी मुद्दे पर विरोध करने का हक सभी को है, संविधान इसकी इज़ाजत भी देता है लेकिन शांति पूर्वक। किन्तु 'नागरिकता संशोधन क़ानून' पर जिस तरह से राजनीति की रोटी सेंकते हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन पूर्वोत्तर के राज्यों में हुआ और देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंचा ये काफ़ी दुखद है। पूर्वोत्तर के राज्यों में जहां अपनी अस्मिता से जोड़ते हुए इसका विरोध किया गया वहीं देश के अन्य राज्यों इस क़ानून को ही गैर-संवैधानिक करार देकर खूब मनमानी हुई।

सवाल उठता है कि क्या देश की न्यायपालिका पर क्या इनको भरोसा नहीं है? क्या सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारियों पर इन्हें शक है? जो खुद ही तय कर ले रहे हैं कि ये कौन सा क़ानून संवैधानिक है और कौन सा गैर-संवैधानिक? और अगर सब कुछ खुद ही तय कर लेना है तो फिर बार-बार लोकतंत्र की दुहाई क्यो?

'नागरिकता संशोधन क़ानून' आर्टिकल 14 का उल्लंघन है ये सुप्रीम कोर्ट ही तय करने दें


नागरिकता संशोधन क़ानून बनने के बाद से देश के अधिकतर क्षेत्र में इसका विरोध संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन बताते हुए किया गया। तर्क ये रहा कि बिल संविधान के आर्टिकल 14 के समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। बेशक हमारा संविधान धर्म के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव और वर्गीकरण को गैर क़ानूनी समझता है लेकिन इसके भी कई पहलू हैं। समता के अधिकार के तहत सरकार भारत में किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं कर सकती है। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि "राज्य किसी नागरिक के खिलाफ सिर्फ़ धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेद नहीं करेगा।"

अब इसी बात को लेकर इंडियन मुस्लिम लीग समेत कांग्रेस नेता जयराम रमेश और अन्य ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस क़ानून पर रोक लगाने से इनकार करते हुए याचिकाओं पर सुनवाई की तारीख 22 जनवरी 2020 तय की है। इसके साथ ही केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी कर दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर देश में सर्वोच्च न्यायालय जैसे संस्था जो भारतीय संविधान के संरक्षक है। जो मौलिक अधिकारों और मानव अधिकारों के गंभीर उल्लंघन से सम्बन्धित याचिकाओं पर विचार करते हुए अपना फैसला सुनाता है उस पर इन तथाकथित लोगों को भरोसा नहीं है? जो आग लगा रहे हैं। और अगर है तो फिर देश में भ्रम और अशांति फैलाने की जूरूरत क्या है। फिलहाल अब  नागरिकता क़ानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट पर सबकी नज़रें टिकी हुई हैं। साथ ही अब सरकार को इस क़ानून को लेकर सही तत्वों और तर्कों के साथ सुप्रीम कोर्ट में ये साबित करना होगा कि ये क़ानून किसी भी तरह से संविधान का उल्लंघन नहीं करता है।

#NRC  #CAB #CAA PROTESTER 

Feb 3, 2019

दौपद्री वस्त्रहरण का पोस्टर लगवाने वाले कॉन्ग्रेसी नेता बताएँगे कि ‘महिला सशक्तिकरण’ क्या है?

मोदी सरकार के अंतरिम बजट में महिला सशक्तिकरण पर कॉन्ग्रेस के नेताओं की प्रतिक्रिया देश की महिलाओं के प्रति उनके वास्तविक रवैए को बताता है। यह बताता है कि किस तरह से विपक्ष में रहकर अच्छे कामों को कोसना चाहिए। बजट के बाद तमाम कॉन्ग्रेसी नेताओं ने ‘महिला सशक्तिकरण’ को लेकर अपने हिसाब से बिना सिर-पैर के सरकार पर निशाना साधा। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री जयंत पाटिल ने कहा कि मोदी सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कुछ नहीं किया है।
इन्हें नहीं लगता है कि सरकार के बजट में ‘उज्ज्वला योजना’ के तहत ₹30 करोड़ की वृद्धि से देश की महिलाएँ सशक्त होंगी। क्योंकि यह मुद्दा तो गैस चूल्हे से जुड़ा है। इन्हें यह भी नहीं पता है कि ‘राष्ट्रीय क्रेच योजना’ में सरकार ने ₹20 करोड़, महिला शक्ति केंद्रों की योजना में ₹35 करोड़, विधवा घरों के लिए ₹7 करोड़ की वृद्धि की है।
इसके बाद भी इनको सरकार की ‘महिला सशक्तिकरण’ को लेकर किया जा रहा प्रयास नहीं दिख रहा है, क्योंकि ये विपक्ष में हैं और इस लिहाज़ से आलोचना करना इनका जन्म-सिद्ध अधिकार है। सवाल उठता है कि जिस सरकार ने आने वाले तीन-चार महीने के बजट में महिलाओं के लिए इतना कुछ किया उसको लेकर वह कॉन्ग्रेस कैसे ताने दे सकती है जिसने 60 सालों तक देश में राज किया हो?
शायद इस बात को यूपी कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता अंशु अवस्थी भी भूल गए, तभी उन्होंने भी आँख बंद करते हुए कह दिया कि मोदी सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर गंभीर नहीं है। जबकि सरकार ने महिलाओं की सशक्तिकरण को बजट में पूरी वैल्यू दी।
बजट में इस बार सरकार ने 2019-20 में ‘महिला सुरक्षा’ और ‘सशक्तिकरण मिशन’ के लिए 
1330 करोड़ आवंटित किए हैं। इसके अलावा सरकार ने ‘प्रधानमंत्री मातृत्व योजना’ के तहत महिलाओं की मैटरनिटी लीव 12 हफ़्ते से बढ़ाकर मातृत्व अवकाश की अवधि को 26 हफ़्ते कर दिया है। सरकार के इन तमाम प्रयासों के बावजूद भी कॉन्ग्रेस के इन नेताओं को लगता है कि सरकार महिलाओं को लेकर गंभीर नहीं है। सही मायने में इनके लिए महिला सशक्तिकरण के मायने अलग हैं।

तेलंगाना में वस्त्रहरण का पोस्टर लगाकर किया गया महिलाओं का अपमान

दरअसल, सरकार के बजट में नुक्स निकालने वाले कॉन्ग्रेसी नेताओं के लिए महिलाओं का अपमान करना ही उनका सशक्तिकरण है। तभी तो तेलंगाना में इनके द्वारा चुनाव आयोग पर निशाना साधने के लिए एक पोस्टर लगाया जाता है, जिसमें दौपद्री का वस्त्रहरण किया जा रहा था। पोस्टर के माध्यम से तेलंगाना में लोकतंत्र को द्रौपदी और धृतराष्ट्र को चुनाव आयोग के रूप में कॉन्ग्रेस द्वारा प्रदर्शित किया गया था।
अब आप इनके ‘महिला सशक्तिकरण’ की सोच को इस पोस्टर लगाने के आधार पर अंदर तक आसानी से समझ सकते हैं, क्योंकि यही वो पार्टी है जिसने ऐसी हरक़त करते हुए हिंदू-मुस्लिम महिलाओं का न सिर्फ़ अपमान किया बल्कि, महिलाओं के प्रति अपनी सोच को भी उजागर किया।

महिला से अभद्रता करने वाले कॉन्ग्रेस के पूर्व सीएम कैसे समझ सकते हैं महिला सशक्तिकरण?

बीते दिनों कर्नाटक के पूर्व सीएम और कॉन्ग्रेसी नेता सिद्धारमैया का एक महिला से अभद्रता करने का मामला सामने आया था। जिसमें वो केवल इस बात को लेकर महिला से अभद्रता कर बैठते हैं क्योंकि उन्हें अपने बेटे के ख़िलाफ़ कुछ भी सुनना अच्छा नहीं लगता है। दरअसल, मामला सिर्फ़ इतना था कि महिला ने सीएम के विधायक बेटे की शिक़ायत लेकर उनके पास पहुँची थी। इस पर सिद्धारमैया ने महिला से न सिर्फ़ अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया बल्कि हाथापाई के दौरान उस महिला से माइक तक छीन लिया। इस हाथापाई में उक्त महिला का दुपट्टा तक सिद्धरमैया के हाथों से गिर गया और अपने इस कृत्य के लिए उन्होंने माफ़ी माँगना तक उचित नहीं समझा।
ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी बन पड़ता है कि अगर सीएम जैसे पद पर रह चुके कॉन्ग्रेसी नेताओं का व्यवहार इस क़दर ज़मीन छूता है, तो सोचिए छुट-भइए नेता महिलाओं के बारे में क्या सोच रखते होंगे? कहते हैं देखने वाले को पत्थर में भी ईश्वर दिख जाता है और न देखने वालों के लिए वह महज़ एक पत्थर ही होता है। ठीक वैसी ही स्थिति कॉन्ग्रेसी नेताओं की है जिन्हें मोदी सरकार के बजट में महिलाओं की सुविधाओं से संबंधित योजनाएँ और व्यवस्थाएँ नज़र नहीं आती।

Feb 1, 2019

₹5 मे भर पेट खिलाने वाली कॉन्ग्रेस बोल रही है कि ₹6 हजार से किसानों का क्या होगा!
संसद में कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने आज अंतरिम बजट 2019 पेश किया। इस मौके पर जहाँ सरकार ने मजदूर, गरीब और किसानों को राहत देने की घोषणाएँ की, तो वहीं दूसरी ओर कॉन्ग्रेस समेत तमाम विपक्षी नेता बजट को लेकर मातम मनाते नज़र आए। दरअसल, सरकार ने ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ के जरिए 2 हेक्टेयर तक भूमि वाले छोटी जोत के किसान परिवारों को ₹6,000 प्रति वर्ष की दर से प्रत्यक्ष आय सहायता उपलब्ध कराने की बात कही, जिसके बाद विपक्ष से अजीबोगरीब प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गईं।
इसके बाद जैसे-तैसे होश संभालते हुए कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी समेत कई अन्य नेताओं ने इसकी आलोचना इस बात का तर्क देते हुए किया कि ₹6 हजार में किसानों का क्या होगा? लेकिन शायद इन्हें 2013 में अपनी ₹5, ₹12 में खाना खिलाने वाली बात याद नहीं आई जिसमें यूपी के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ने गरीबों को ₹12 में भरपेट खाना मिलने की बात कही थी। इसके अलावा पार्टी के नेता ने रशीद मसूद ने यहाँ तक दावा कर दिया था कि दिल्ली में ₹5 में भरपेट खाना मिलता है।

कंज़ंप्शन एक्सपेंडिचर सर्वे से उड़ी थी कॉन्ग्रेस की नींद 

दरअसल, 2013 में यूपीए सरकार के दौरान कंज़ंप्शन एक्सपेंडिचर सर्वे में गरीबी के नए आँकड़ों के बचाव में राज बब्बर ने ऐसा कहा था। रिपोर्ट में कॉन्ग्रेस के ‘गरीबी हटाओं’ के नारे की पोल खुली थी। रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि पिछले 12 सालों में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ी। रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि 2000 से 2012 के बीच अमीर तबके के ख़र्च करने की क्षमता 5 से 60% बढ़ी थी, वहीं गरीब की इन 12 सालों में ख़र्च करने की ताकत 5 से 30% तक ही बढ़ पाई थी।
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यह हास्यास्पद है कि गरीबों के वोटबैंक की चाह लेकर उनके द्वार जाने वाली कॉन्ग्रेस मोदी सरकार के साल में ₹6 हजार यानी महीने में ₹500 देने की बात का मज़ाक उड़ा रही है। शायद कॉन्ग्रेसी नेता यह भूल गए हैं कि उनके ₹5 में भरपेट खाना खिलाने में रोज के 5X365= ₹1825 ही आते थे।
वैसे भी, इन पैसों से किसान खेती करेगा, क्योंकि उन्हें थोड़ी मदद मिल जाए, बीज-खाद के पैसे मिल जाएँ, तो वो फसल उगा लेंगे, और खाना भी खा लेंगे। जब किसान लगातार सूद और महाजन के जंजाल में फँसकर आत्महत्या करते हैं, तो उसका समाधान एक बार की क़र्ज़माफ़ी नहीं, बल्कि सतत प्रयासों से उसके जीवन में स्वाबलंबन लाना है। किसी को भी मुफ़्तख़ोरी अच्छी नहीं लगती, ख़ासकर उस किसान को तो बिलकुल ही नहीं जिसका जीवन सरकार, तंत्र, मौसम और पैसों की किल्लत से लड़ते हुए जीने में कट जाती है।

कॉन्ग्रेसी और विपक्षी नेताओं का प्रलाप उनकी घबराहट को दर्शाता है

सरकार द्वारा ‘सबका साथ, सबका विकास’ के तर्ज़ पर पेश किए गए इस बजट पर विपक्षी नेताओं का ऊल-जूलूल बोलना उनकी घबराहट को भी दर्शाता है। शायद राहुल गाँधी इस आँकड़े और ₹5 में खाना खिलाने वाली स्कीम भूल गए तभी उन्होंने सरकार के किसानों को ₹6 हजार देने की बात का यह कहते हुए विरोध किया कि ₹17 दिए जाने का प्रावधान करना किसानों का अपमान है।\

राहुल गाँधी को अब यह बात कौन समझाए कि किसानों के लिए एक-एक पैसे कि कितनी महत्ता है। राहुल गाँधी भूल गए कि यह रकम उनके हाथ में न आकर सीधे बैंक खाते में जाएगी।किसान यह समझता है, भले ₹13 का ऋण माफ़ी देने वाले राहुल न समझें, कि ये पैसे उनकी बीड़ी के लिए नहीं है। वो जानते हैं कि इतने पैसों में बुआई के समय वो खेत में बीज रोप सकते हैं। अगर सरकार की हर योजना का लाभ उन्हें मिले, तो यह मदद बड़ी मदद है।

https://hindi.opindia.com/national/its-ironical-that-congress-is-calculating-pm-kisan-scheme-when-they-announced-rs-5-was-enough-for-a-meal/

Dec 23, 2018


भारत का राजनैतिक परिदृश्य और भारतीय जनता 

आशीष कुमार शुक्ला 

''लोगों ने नहीं तुमने ही इस मिट्टी को बदनाम कर दिया
आज बिक रही है आबरू मेरे देश की, हाय !
मेरे देश के नेताओं ने देश को श्मशान कर दिया''
सत्ता की चाह और वोटबैंक की राजनीति आज लोकतंत्र को जितना घाव दे सकती है, दे रही है. अपनी सभ्यता और संस्कृति के लिए विश्व विख्यात हमारा देश आज अपनी मूल पहचान को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है. देश में अब केवल नाम मात्र का राजनेता बचा है, और लोभ लालच, स्वार्थ हित की राजनीति.
वो दौर और था जब समाजवादी भारत की कल्‍पना करने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भारत की पिछड़ी, दलित, गरीब और वंचित जनता के लिए एक भारत श्रेष्ठ भारत का सपना देखा. अब वो दौर भी नहीं रहा जहां लाल बहादुर शास्‍त्री जैसे नेता हों, जो अपनी सादगी, ईमानदार छवि के बूते पर बिना भेदभाव राष्ट्र के लिए अपना जीवन समर्पित कर दें.
साहब ! अब उस दौर की राजनीति हो रही है, जहां स्वार्थ, परिवार हित, राजनीति का आधार है. कहते हैं हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और होते हैं, ठीक वैसे ही आज राजनीति में जातिवाद भी शामिल है. जब चुनाव नजदीक आता है, तब हिंदू, मुस्लिम, के नाम पर वोट मांगे जाते हैं लेकिन सत्ताशीन होने के बाद ये नेता न हिंदू के होते हैं और न मुस्लिम के ये बस अपने स्वार्थ, अपनी संपत्ति, अपने करीबियों को चमकाने में लग जाते हैं. वहीं बेचारी जनता जिस हाल में पहले थी उससे भी बदतर हो जाती है.
आज देश में भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद और जातिवाद पूरी तरह से हावी हो चुका है, ये वो समस्याएं हैं जहां देश घुटने टेकने के लिए मजबूर है. जिस लोकतंत्र का हमने 70 साल पहले सपना सजाया था वो अब टूटता नजर आ रहा है. लोकतंत्र जिसमें "जनता द्वाराजनता के लिएजनता का शासन है" है अब वो केवल नाम के लिए रह गया है, जनता वही है, शासक भी हमारे बीच के हैं, लेकिन राजनीति का स्तर खत्म हो चुका है. अब राजनीति में आना मतलब सत्ता का सुख भोगना है. हलांकि लोकतंत्र पर जो विश्वास जनता का बना हुआ है वो केवल इसलिए, क्योंकि कुछ एक नेता अभी ऐसे हैं, जो राष्ट्र और जनता के हित के लिए काम कर रहे हैं.

राजनीति का मूल आधार नोट के बदले वोट
सत्ता में आना है तो नोट उड़ाना है, मौजूदा समय में भारतीय राजनीति में धनबल, बाहुबल का बोलबाला है. ये एक ऐसी विचारधारा है जो आज राजनीति का कोर बनी हुई है. यही वजह है कि चुनाव में जनता न तो अपने बौद्धिकता का इस्तेमाल कर पा रही है, और न ही अपने पसंद के राजनेता का चयन. कार्ल मार्क्स ने कहा है कि "धर्म जनता की अफीम है" मतलब धर्म के लिए हमारा दिमाग सोचना बंद कर देता है, और हम वही करते हैं जो हमसे करवाया जाता है. जाति-धर्म के इस बंधन ने भी राजनीति के स्तर को गिराया है. तमाम राजनेता इसी के आधार पर दशकों से सत्ताशीन हैं. जनता की समस्याओं को उठाकर सत्ता में आने वाले नेता सत्ता पाते ही इसके नशे में चूर हो जाते हैं, और जमीनी हकीकत जस की तस बनी रखती है.
ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहां, आज देश को भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद और जातिवाद से निकलने की जरूरत है, वहीं देश की कोई राजनीतिक पार्टियां अपने को आगे लाकर समाज में व्याप्त इन समस्यों के समाधान पर गौर नहीं कर रही हैं. आज राजनीतिक पार्टियों का बस चले तो जांच एजेंसियों, केंद्रीय सतर्कता आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक, मीडिया पर भी अंकुश लगा दें.

कैसे हो सकती है सुचिता की राजनीति ?
धर्म लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाता है, राजनीति का उद्देश्य है लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उनके हित में काम करना है, जब धर्म और राजनीति साथ-साथ नहीं चलते, तब हमें भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और कपटी धार्मिक नेता मिलते हैं. एक धार्मिक व्यक्ति, जो सदाचारी और स्नेही है भले ही किसी धर्म का हो, वो जनता के हित का ध्यान रखेगा और एक सच्चा राजनीतिज्ञ बनेगा, और सही मायने में लोकतंत्र का जो मूल आधार है वो सिद्ध हो सकेगा. तभी जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता के शासन के सपने को साकार किया जा सकेगा.
राजनीति के घटते स्तर के लिए केवल राजनेताओं को ही जिम्मेदार ठहराना न्याय संगत नहीं होगा, क्योंकि इनके कोर में जनता है. वही जनता जो इन्हे समर्थन करती है, जो इन्हे फर्स से अर्स तक पहुंचाती है. उसे भी विचार करने की जरूरत है, कि जिस समस्या के लिए वो सिर पटक रही है उसकी जननी तो वही है. जनता को सोचना चाहिए, विचार करना चाहिए उसके बाद ही मतदान करना चाहिए क्योंकि जिस लोकतंत्र में हम रह रहे हैं, उसमें जनता ही जनार्दन है. सही मायने में मतदाता ही लोकतंत्र का सजग प्रहरी भी है, लेकिन जातिवाद, धर्म के नाम पर आम जनता बटी हुई है.
ऐसे में लोकतंत्र की ताकत होने के बावजूद जनता की धार कुंद हो चुकी है. आज जरूरूत है इन सबसे ऊपर उठकर एक ऐसी सोच विकसित करने की, जहां जातिवाद, क्षेत्रवाद न हो, जहां स्वार्थी न बनकर राष्ट्रहित के लिए उस नेता का चयन हो जो सच में राष्ट्र का विकास कर सके, क्योंकि जाति और धर्म की राजनीति से सिर्फ कुछ एक लोग का भला हो सकता है लेकिन संपूर्ण राष्ट्र का नहीं. जनता को इस कुंठित विचारधारा से बाहर आकर राष्ट्र के लिए सोचना चाहिए ऐसी सोच से ही देश के लोकतंत्र को बचाया जा सकता है.

Sep 4, 2018


वोट बैंक, राजनीति, और मॉब लिंचिंग 
अगर देश में मॉब लिंचिंग की घटनाएं ऐसे ही बढ़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हम उस जंगल में रह रहे होंगे जहां, हर वक्त छोटे जानवर शेर से अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं. 
सत्ता की चाह और वोटबैंक की राजनीति आज लोकतंत्र को जितना ज्यादा घाव दे सकती है, दे रही है. और इन्हीं की बदौलत हमारा देश ऐसी दूषित मांसिकता की ओर बढ़ रहा है, जिसे देखकर शायद आतंकी भी घबरा जाए. आतंकियों का क्या उनके लिए लोगों में दहशत फैलाना ही उनका धर्म और कर्म है, लेकिन जिस मांसिकता को लेकर देश आगे बढ़ रहा है, वह शायद इन दहशतगर्दों की सोच से कही ज्यादा घातक है. 
आज देश में जिस प्रकार से मॉब लिंचिंग (भीड़ हत्या) की घटनाएं बढ़ रही हैं, अगर ये ऐसे ही बढ़ती रहीं तो हमारे देश का क्या हाल होगा ये सोचकर रूह काप जाती है. पिछले कुछ सालों में जिस प्रकार से मॉब लिंचिंग की घटनाएं सामने आई हैं, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है, कि बीते कुछ सालों में हमारा देश जाने-अनजाने किस मांसिकता का शिकार हो रहा है.
2015 में बकरीद के मौके पर अख़लाक़ नाम के युवक की मौत के बाद से देश में ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं. जब अख़लाक़ को इकट्ठी हुई भीड़ ने मार डाला था, तब उस वक्त तमाम राजनेताओं ने वोट बैंक बढ़ाते हुए उनके परिवार के प्रति सहानुभूति जताई थी. तब एक वक्त को ऐसा लगा था कि, शायद इस घटना के बाद सरकार कोई सीख लेगी और लोगों को मार डालने वाली भीड़ के लिए सख्त कानून बनाएगी. लेकिन हमारे देश का दुर्भाग्य है कि, उसी सहानुभूति को बार-बार देकर हमारे राजनेता अपना वोट बैंक बढ़ाना चाह रहे हैं. उन्हे शायद इस बात से फर्क नहीं पड़ता की मौत किसकी हुई है और कौन जिम्मेदार है. 
ऐसी घटनाओं के लिए कोई कठोर कानून होने की वजह से आज लोग इकट्ठा होकर किसी को पीटने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं. जिस व्यक्ति के बारे में वो जानते तक नहीं, उसको इस तरह पीटते हैं जैसे उनका पुराना दुश्मन हो. यह आखिर हो कैसे रहा है कि, किसी अफवाह को सुनकर या कोई आधरहीन शक पैदा होने पर और फिर किसी सोची-समझी योजना के तहत एक भीड़ इकट्ठी होती है किसी को पीट-पीटकर जान से मार डालती है? आखिर इतना आक्रोश पैदा कहा से होता है लोगों के अंदर? यह सोचने वाली बात है. 
सवाल उठता है कि, आखिर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले लोग जरा भी रहम क्यों नहीं दिखाते हैं? क्या उनके अंदर से मानवता, संवेदनशीलता, खत्म हो गई है? आखिर ये भीड़ कानून को अपने हाथ में लेकर खुद को योद्धा क्यों साबित करना चाहती है? क्या संविधान और कानून पर इन्हें भरोसा नहीं रहा, जो ख़ुद न्याय और नैतिकता के दायरे तय करना चाहती है?. इन सवालों का जवाब शायद कोई दे पाए, क्योंकि इन्हें बढ़ाने और इनका पालन पोषण करने वाला कोई और नहीं बल्कि सरकार है.
देश में बढ़ रहीं ऐसी घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी चिंतित है, लेकिन सत्ता में बैठे नेताओं को जो देश के लिए मर-मिटने की बात करते हैं, उन्हें अपनी लग्जरी लाइफ जीने से फुर्सत ही नहीं है, कि वो देश में हो रही ऐसी घटनाओं पर सख्ती से रोक लगाएं. शायद यही वजह है कि, हाल में सुप्रीम कोर्ट ने इन घटनाओं की रोकथाम के लिए सरकार से कड़े कदम उठाने के आदेश दिए हैं, लेकिन अब ये देखना होगा कि इसपर सरकार की आंख कब खुलती है.

मॉब लिंचिंग जैसे घटनाओं को लेकर सरकार को सख्त होने की जरूरत है, अगर जल्द ही कड़े कानून और कड़ी सजा का प्रावधान नहीं किया गया, तो ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ेंगी, जिन्हे रोक पाना आसान नहीं होगा. अभी स्थिति हद में है, अगर ऐसा चलता रहा, तो निश्चित रूप से एक दिन ऐसा आएगा जब हम कदम-कदम पर असुरक्षित महसूस करेंगे. हमें हर वक्त ये डर रहेगा कि, कहीं कोई हमारा शिकार कर ले. हम उस जंगल में रह रहे होंगे जहां, हर वक्त छोटे जानवर शेर से अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं. 
बीबीसी खबर वैब पोर्टल में छापा गया...
http://www.bbckhabar.com/Landing_story.aspx?Article_Id=3035