Jan 16, 2015

बहुत हुआ अब और नहीं

आशीष शुक्ला
आज जिस तरह से महिलाओं का शोषण किया जा रहा है, यह सिर्फ असहनिय नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, सभ्यता का खात्मा करने के लिए काफी है। महिला आजादी के बाद भी स्वतंत्र नहीं है। ना सिर्फ बाहर उसका शोषण किया जाता है, बल्कि अब वह घर में भी अपने आपको असुरक्षित समझती हैं। घर से निकलने के लिए कई बार सेचती है। उसे डर है कि कही कोई हैवान उसकी इज्जत-आबरू को तार-तार ना कर दे। अब यह शर्मसार करने वाला मुद्दा ही नहीं रहा बल्कि यह भारत सहित कई अन्य देशों की सबसे बड़ी समस्या बन चुका है।
शास्त्रों में कहा गया है, कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का निवास होता है। जहां देवताओं का निवास होता है उस घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। इसलिए जरूरी है कि महिलाओं को सम्मान और आदर प्राप्त हो, परन्तु आज ऐसा बिलकुल नहीं है। महिलाओं के साथ रोजाना बस और ट्रेन में  छेड़छाड़ जैसी शर्मनाक घटनाएं सामने आती रहती हैं। दिल्ली 16 दिसबंर एक युवती से चलती बस में हुए गैंगरेप के बाद भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध पर जोरदार राष्ट्रीय बहस हुई। परन्तु उसका क्या हुआ, आज जिस तरह से महिलाओं की सुरंक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है, किसी से छिपा नहीं है। महिलाओं की सुरंक्षा के लिए सरकार ने कई कानून बनाये परन्तु उनको सही से अमल में नहीं लाया जा रहा। व्यापक तौर पर, भारत की वैश्विक छवि (व्यापक गरीबी से लेकर तकनीक कुशलता और बॉलीवुड संस्कृति के जश्न तक) इसकी आधी आबादी द्वारा प्रतिदिन झेले जाने वाले दबाव और धमकियों की व्याख्या से धूमिल हो रही है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा का मुद्दा सिर्फ भारत तक केंद्रित नहीं है, बल्कि पूरे विश्व की समस्या है। महिला थाने में दर्ज होने वाले आपराधिक प्रकरणों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट में बताया गया था कि अक्टूबर 2014 तक रेप के 1330 मामले, जबकि छेड़छाड़ के 2844 मामले सामने आए थे। राष्ट्रीय राजधानी में महिलाओं के खिलाफ अपराध में साल 2013 के मुकाबले 2014 में 18.3 फीसदी, दुष्कर्म के मामले में 31.6 फीसदी, की वृद्धि हुई थी। 15 दिसंबर तक भारतीय दंड संहिता (आपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत साल 2014 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के 14,687 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2013 में यह आंकड़ा 12,410 था।
आंकड़ों में यह खुलासा हुआ है कि साल 2014 में दुष्कर्म के 2,069 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2013 में यह आंकड़ा 1,571 था। राजधानी में छेड़छाड़ के साल 2013 के 3,345 मामलों की तुलना में 2014 में 4179 मामले दर्ज किए गए। साल 2014 में उत्पीड़न के 1,282 मामले सामने आए थे, जबकि 2014 में यह आंकड़ा 879 था। साल 2014 में दहेज हत्या के 147 मामले सामने आए, जबकि 2013 में यह आंकड़ा 137 था। मौजूदा आंकड़े भारत में महिलाओं  के साथ हो रहे अत्याचार को बताने के लिए काफी हैं। महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ अपराध से जुड़े मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए त्वरित निपटान अदालत समेत अन्य अदालातों का गठन करना भारत के संविधान के तहत राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस संबंध में त्वरित निपटान अदालत गठित करने में उच्च न्यायालयों की मदद करनी चाहिए। यदि महिलाएं अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं तो समाज का बना ताना-बाना टूट जाता है। यह एक मानवाधिकार का मुद्दा है, पुरुषों एवं महिलाओं को इस अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहिए। और इसका समाधान ढूंढने के लिए एक साथ खड़े होना चाहिए। हमें विश्व स्तर पर हाथ मिलाकर मानवीय मूल्यों को पुन: स्थापित करने के लिए और महिलाओं के खिलाफ हिंसा और दुर्व्यवहार को रोकने के लिए मिलकर आवाज उठाने की आवश्यकता है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या कम करने के लिए समाज को मानसिकता बदलने की जरूरत भी है।

(यह के अपने विचार हैं,)

Jan 9, 2015

बाल श्रम गंभीर चिंता का विषय....

आशीष शुक्ला

आज़ादी को 68 साल हो गये  परन्तु क्या आज व्यक्ति सच में आजाद है यह गंभीर चिंतन का विषय है। बाल मजदूरी,बधुंआ मजदूरी आज भी हमारे समाज में विद्यमान है जो अत्यधिक लज्जा का विषय है, सरकार इससे निपटने का पूरा प्रयास कर रही है, परन्तु लगातार नाकाम हो रही है। जिसका बहुत बड़ा कारण यह  है, कि बहुत से गरीब परिवार अपने बच्चों के मजदूरी के सहारे ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

दुनिया में लगभग २.५ करोड बच्चे, जिनकी आयु २-१७ साल के बीच है वे बाल-श्रम में लिप्त हैं, बाल श्रम कृषि निर्वाह और शहरों के अन-औपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, भारत और बंग्लादेश सहित कई देशों में आज भी बाल श्रम व्यापक रूप से विद्यमान है। देश के कानून के अनुसार १४ वर्ष से कम आयु के बच्चे काम नही कर सकते, फिर भी मौजूदा कानून को नजरअंदाज किया जा रहा है। आज स्थिति तो यह है कि ११ साल जैसे छोटी उम्र के बच्चे २० घंटे तक एक दिन में काम कर रहे हैं। जो की भारत के भविष्य का खात्मा करने के लिए काफी है।  बाल मजदूरी औद्योगिक क्रांति के आरम्भ के साथ प्रारंभ हुई। देश के समक्ष बालश्रम की समस्या एक चुनौती बनती जा रही है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कई गंभीर कदम उठाये हैं। समस्या के विस्तार और गंभीरता को देखते हुए इसे एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानी जा सकती है। जो चेतना की कमी, गरीबी और निरक्षरता से जुड़ी हुई है। 1979 में भारत सरकार ने बाल-मज़दूरी की समस्या और उससे निज़ात दिलाने हेतु उपाय सुझाने के लिए 'गुरुपाद स्वामी समिति' का गठन किया था। समिति ने समस्या का विस्तार से अध्ययन किया और अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की। बच्चों का नियोजन इसलिए किया जाता है, क्योंकि उनका आसानी से शोषण किया जा सकता है। संविधान के मौलिक अधिकार में यह बताया गया है, कि 14 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा, परंतु आज जो लोग बाल मजदूरी करवाते हैं उनके लिए ना मौजूदा कानून मायने रखता और ना ही संविधान। दुनिया में जितने बाल श्रमिक हैं, उनमें सबसे ज्यादा बाल श्रमिक भारत में हैं। अनुमान है कि दुनिया के बाल श्रमिकों का एक तिहाई हिस्सा भारत में है। इस स्थिति का परिणाम बहुत व्यापक है। इसका मतलब यह है कि इस देश के करीब 50 प्रतिशत बच्चे बचपन के अधिकारों से वंचित हैं और वे अनपढ़ कामगार ही बने रहेंगे और उन्हें अपनी सच्ची क्षमताएँ हासिल करने का कोई मौका नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में कोई भी देश कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करने की उम्मीद कैसे कर सकता है।
देश में बाल श्रम की स्थिति की विडम्बना यह है कि यह मान ही लिया जाता है कि हर मजदूर इसलिये काम कर रहा है कि यह उसके परिवार के जिन्दा रहने का मामला है। लेकिन यह गरीबी की दलील का अत्यन्त कपटपूर्ण पहलू है। सच्चाई से इतना दूर और कुछ हो ही नहीं सकता। गरीबी की दलील’’ और शिक्षा की अप्रासंगिकता की अवधारणा ने बाल श्रम और शिक्षा से संबधित सरकारी कार्यक्रम बनने में मुख्य भूमिका अदा की है। बच्चे किसी देश या समाज की महत्वपूर्ण सम्पति होते हैं, जिनकी समुचित सुरक्षा, पालन-पोषण, शिक्षा एवं विकास का दायित्व भी राष्ट्र और समुदाय का होता हैं।  जहाँ एक ओर बाल कल्याण से संबन्धित अनेक विषयों पर विश्व जनमत गंभीरता से सोच रहा है, वहीं दूसरी ओर बाल श्रमिकों की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। विशेषकर विकासशील दिशों में यह समस्या अधिक विकराल रूप में दृष्टिगत हो रही है। आज विश्व में लगभग 25 करोड़ बाल श्रमिक हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के रिपोर्ट के अनुसार भारत में बाल मजदूरों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है। भारत में अनुमानत: बाल श्रमिकों की संख्या 440 लाख से 1000 लाख तक है, किन्तु अधिकृत रूप से इनकी संख्या 17.5 लाख बताई गई है। समस्त विश्व के 25 करोड़ बाल श्रमिकों में से मात्र भारत में ही इसके एक तिहाई बाल श्रमिक हैं। कुल बाल श्रमिकों का 30 प्रतिशत खेतिहर मजदूर तथा 30-35 प्रतिशत कल कारखानों में कार्यरत हैं। शेष भाग पत्थर खदानों, चाय की दूकानों, ढाबों तथा रेस्टोरेंट एवं घरेलू कार्यों में लगे हुए हैं, एवं गुलामों जैसा जीवन जी रहे हैं। बाल श्रमिकों के वर्त्तमान आंकड़े यह प्रदर्शित करते हैं कि कृषि क्षेत्र में 1 करोड़ 22 लाख, जम्मू कश्मीर के कालीन उद्योग में 1 लाख शिवकासी के आतिशबाजी और माचिस उद्योग में 1 लाख बच्चे, फिरोजाबाद के कांच उद्योग में 1 लाख बच्चे आगरा और कानपुर के चर्म उद्योग में 30 हजार बच्चे, लखनऊ में चिकन के काम में 50 हजार, बच्चे, भदोही के कालीन उद्योग में 1 लाख 25 हजार बच्चे, सहारनपुर के लकड़ी के उद्योग में 10 हजार बच्चे तथा मिर्जापुर में 8 हजार बच्चे एवं वाराणसी के रेशम उद्योग में 5 हजार बच्चे बाल श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं। हमारे समाज में चली आ रही शोषण परम्परा का बाल मजदूरी एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है, यह औद्योगिकरण की प्रक्रिया से उभरे मालिक मजदूर समीकरण का विस्तार है। वैसे तो दुनिया के अन्य देशों में भी यह एक विकट समस्या का रूप ले चुका है। लेकिन भारत में इसका रूप कुछ और ही भयावह है। बाल मजदूरी करवाने वालों के लिए कानून में निम्न प्रावधान हैं। काम करवाने वाले मालिक को तीन महीने से एक साल तक की कैद वह दस हजार से बीस हजार तक का जुर्माना देना पड़  सकता है। परन्तु जो व्यक्ति बाल मजदूरी करवाने का साहस कर सकता है उसके लिए इतनी सजा कफी है, यह विचार करनें लायक है। जब तक सरकार इस पर गहन विचार करके इसमें कोई बदलाव नहीं करती शायद तब तक बाल मजदूरी को नहीं रोका जा सकता। सरकार को मौजूदा सजा नीति को बदलना चाहिए। जब बाल मजदूरी करवाने वालों को किसी बड़ी सजा का भय नहीं होगा तब तक वह ऐसे ही बाल मजदूरी करवाते रहेगें। इस समस्या से समाधान पाने हेतु समाज के सभी वर्गों को सामूहिक प्रयास करना होगा तभी भारत को बाल श्रम मुक्त बनाया जा सकता है।

(यह लेखक के अपनें विचार हैं)

Jan 7, 2015

चिंता का विषय .....आज भी भारत आशिक्षा युक्त क्यों....?


Jan 6, 2015

कब आशिक्षा मुक्त होगा भारत .....?



आशीष शुक्ला


प्रशिक्षित युवाओं की आवश्यकता देश में भी है और विदेश में भी उनकी मांग लगातार बढ़ रही है। परन्तु आज के इस आधुनिक युग में जिस तरह से शिक्षा का स्तर मात्र दिखावे के के लिए ऊंचा किया जा रहा है यह काफी गंभीर चिंता का विषय है। मौजूदा शिक्षा नीति भी अच्छी है, और शिक्षा का स्तर भी परन्तु आज भी कई ऐसे विद्यालय हैं जहां नकल का बोल-बाला अपनी चरम सीमा पर है। यही कारण है कि डिग्री होने के बावजूद आज का युवा बेरोजगार घूम रहा है। 

भारत की लगभग आधी आबादी 25 साल से कम उम्र की है। इनमें से 12 करोड़ लोगों की उम्र 18 से 23 साल के बीच है। अगर इन्हें ज्ञान और हुनर से लैस कर दिया जाए तो ये अपने बल-बूते पर भारत को एक वैश्विक शक्ति बना सकते हैं। कई विश्वविद्यालयों में पिछले 30 सालों से पाठ्यक्रमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। ''पुराना पाठ्यक्रम और जमीनी हकीकतों से दूर शिक्षक उच्च शिक्षा को मारने के लिए काफी हैं। शिक्षा में निजीकरण की जरूरत है, लेकिन इस पर भी नियंत्रण रखा जाना चाहिए। आम धारणा ये है कि अगर कोई लाभ कमाना चाहता है तो वो अच्छी शिक्षा कैसे दे सकता है। हर साल भारतीय स्कूलों से पास होने वाले छात्रों में महज 15 फीसदी छात्र विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाएं, यह सुनिश्चित करने के लिए पूरे भारत में 1500 नए विश्वविद्यालय खोले जाने की जरूरत पड़ेगी। इस सबके लिए धन सिर्फ निजी क्षेत्र से आ सकता है। स्कूलों में अध्यापकों की कमी एक बिकट समस्या है। पिछड़े क्षेत्रों में अध्यापकों की कमी बहुत ज्यादा है। अनुमान है कि 7.74 लाख अध्यापकों के पास पढ़ाने के लिए जरूरी योग्यता नहीं है। विद्यालयों की बढ़ती संख्या यह तो बताती है कि हाल के वर्षों में शिखा की मांग काफी बढ़ी है। दूसरी  तरफ सरकार गुणवत्ता वाली शिक्षा देने में नाकाम  साबित हो रही है। ऐसे में सबसे पहले शिक्षकों और कक्षाओं की संख्या बढ़ानी होगी। सरकार शिक्षा सुधार का काम काफी धीमी गति से कर रही है। दसवीं कक्षा के लिए निरंतर और विस्तृत मूल्यांकन प्रणाली का मामला है। इसके लिए ऑडियो विजुअल तरीके अपनाने जैसी नई शिक्षा सुविधाओं को अपनाने की जरूरत है। यह प्रणाली बहुत आधुनिक है लेकिन यह उस भारतीय व्यवस्था से मेल नहीं खाती जहां छात्र अध्यापक अनुपात दुरुस्त नहीं है। किसी भी सरकार, खास कर विकासशील देश की सरकार के लिए ये संभव नहीं है कि वो मौजूदा 300 विश्वविद्यालयों को ढंग से चला पाए। यह तभी संभव है जब वित्तीय मापदंडों को दरकिनार कर दिया जाए या उच्चतर शिक्षा को घटिया दर्जे का बना दिया जाए। विशेषज्ञों की राय है कि 'रन ऑफ़ द मिल' यानी बने बनाए ढर्रे पर स्नातक पैदा करने की प्रवृत्ति से जितनी जल्दी छुटकारा पाया जाए उतना ही अच्छा है। आजकल का सबसे प्रचलित जुमला है नौकरी से जुड़े कोर्स। फैसला लेने वालों के बीच वोकेशनल शिक्षा या व्यावसायिक शिक्षा का वो रुतबा अब नहीं रहा क्योंकि इसके साथ ये बट्टा लगा हुआ है कि ये पढ़ाई में पीछे रहने वालों की ही पसंद है। 21वीं सदी की उच्च शिक्षा को तब तक स्तरीय नहीं बनाया जा सकता जब तक भारत की स्कूली शिक्षा 19वीं सदी में विचरण कर रही हो। स्कूली शिक्षा की मूलभूत सुविधाओं में पिछले एक दशक में जबरदस्त वृद्धि हुई है, असली समस्या गुणवत्ता की है। यह एक कड़वा सच है कि भारत के आधे से अधिक प्राथमिक विद्यालयों में कोई भी शैक्षणिक गतिविधि नहीं होती। अब समय आ गया है कि चॉक और ब्लैकबोर्ड के जमाने को भुला कर गांवों में भी प्राथमिक शिक्षा के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जाए। सरकारी स्कूलों की दशा लगातार गिरती जा रही है। सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें, इन स्कूलों की साख को व‌र्ल्ड बैंक या यूनेस्को की सहायता भी बचा नहीं पाई है। बच्चों के स्कूल में हर प्रकार की कमियां आज भी विद्यमान हैं। भ्रष्ट तथा संवेदनहीन व्यवस्था में इसमें सुधार की संभावना क्षीण ही रहती है। आने वाले दिनों में ज्ञान दुनिया के किसी भी समाज से ज्यादा प्रतिस्पर्धात्मक बन जाएगा। दुनिया में गरीब देश शायद समाप्त हो जाएं लेकिन किसी देश की समृद्धि का स्तर इस बात से आंका जाएगा कि वहाँ की शिक्षा का स्तर किस तरह का है। आजकल वैश्विक अर्थव्यवस्था, विकास, धन उत्पत्ति और संपन्नता की संचालक शक्ति सिर्फ शिक्षा को ही कहा जा सकता है। आज युवा बेरोजगार घूम रहा है उसके पास डिग्री है परन्तु उसे रोजगार नहीं मिल रहा मौजूदा शिक्षा नीति से काम नहीं चलने वाला जरूरत है शिक्षा क्षेत्र में विकास करने की और ऐसी नीति तैयार करने की जो दिखावे मात्र के ले ना हो बल्कि शिक्षा देने के लिहाज से भी उपयुक्त हो क्योकि जब तक देश का युवा शिक्षित नहीं होगा तब तक ना भारत से बेरोजगारी को खत्म किया जा सकता है और ना ही आर्थिक व्यवस्था को। 
(यह लेखक के अपने विचार हैं )