Dec 12, 2014

धर्मांतरण आखिर क्यों....?
आशीष शुक्ला....
हमारा समाज सभी जाति धर्मो से र्निमित है, भारत के प्रत्येक व्यक्ति को संबिधान जाति, धर्म, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर समानता का अधिकार प्रदान करता है। यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म को छोड कर दूसरे धर्म को अपनाना चाहे तो संबिधान इसके लिए भी उसे यह अधिकार प्रदान करता है, वह स्वतंत्र रूप से किसी भी धर्म को अपना सकता है। धर्मांतरण किसी ऐसे नये धर्म को अपनाने का कार्य है, जो धर्मांतरित हो रहे व्यक्ति के पिछले धर्म से भिन्न हो। एक ही धर्म के किसी एक संप्रदाय से दूसरे में होने वाले परिवर्तन को सामान्यतः धर्मांतरण  के बजाय पुनर्संबद्धता  कहा जाता है।
अनेक कारणों से लोग विभिन्न धर्मों में धर्मांतरित होते हैं, जिनमें विश्वास में हुए परिवर्तन के कारण स्वेच्छा से होने वाला सक्रिय धर्मांतरण, द्वितीयक धर्मांतरण, मृत्यु-शैय्या पर होने वाला धर्मांतरण, किसी लाभ के लिये किया जाने वाला तथा वैवाहिक धर्मांतरण एवं बलपूर्वक किया जाने वाला धर्मांतरण शामिल हैं। धर्मातरण विवाद में जानी-मानी लेखिका तसलीमा नसरीन कहा है कि अगर गरीब मुस्लिम पैसे और भोजन के लिए हिंदू धर्म ग्रहण करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा करने दिया जाए। गरीब हिंदू भी इसी कारण इस्लाम और ईसाइयत को अपनाते हैं। इनका मानना है कि मजहब बिकता है। अपने बेबाक लेखन के कारण कट्टरपंथियों के निशाने पर रहने वालीं तसलीमा ने ट्वीट के जरिये यह भी कहा है कि इस्लाम में जबरन धर्मातरण की मनाही है। बाद में ऐसा होने लगा। जबरन धर्मातरण न होता तो आज इस्लाम अस्तित्व में नहीं होता। हिंदुओं के धर्मातरण के लिए मुस्लिम और ईसाइयों को दोषी ठहराती रही हैं और यही कारण है कि जब हिंदू भी ऐसा करते हैं तो उन्हें बुरा लगता है। उनके मुताबिक उपासना पद्धति के चयन की स्वतंत्रता होनी चाहिए। तसलीमा ने अपने पूर्वजों को मूर्तिपूजक बताते हुए कहा है कि वे हिंदू से मुसलमान बने। कई साल आगरा में गुजारने के बाद भी मुसाफिरों जैसी जिंदगी बिता रहे लगभग 60 मुस्लिम परिवारों के 387 सदस्यों हिंदू धर्म कुबूल कर लिया। यह स्पस्ट नहीं है कि उन्होनें स्वः इच्छा से धर्मांतरण किया है, या उन्हे लालच देकर इसके लिए बाध्य किया गया है।  जिसके बाद मुस्लिम समाज के सैंकडों लोग धरने पर बैठ गए। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) और बजरंग दल पर शहर की फिजां बिगाडने का आरोप लगाया और आरोपियों को गिरफ़तार कर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगाने की मांग की। धर्मांतरण को लेकर मचे बवाल को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने सख्त कदम उठाए हैं। अवैध धर्मातरण के लिए सभी जिलों में एसपी-एसएसपी की जवाबदेही तय करते हुए प्रमुख सचिव गृह देवाशीष पंडा ने अलर्ट जारी किया। महत्त्व अस्तित्व के तथ्य का नहीं है, बल्कि अस्तित्व के स्तर का है। इस्लामी संस्कृति के प्रसार के लिए मुसलमानों ने एक नियमित और तेज अभियान चलाया कहा जाता है, कि धर्म-परिवर्तन के अपने आंदोलन द्वारा उन्होंने हिंदू धर्म के लोगों को अपनी ओर करके अपनी संख्या में भारी वृद्धि कर लीभारतीय संस्कृति की यही तो विशेषता रही है यही संस्कृति 'बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय और वसुधैव कुटुंबकम् की पावन भावना का विकास करती है। हमारे भीतर स्व और पर का भेद नहीं होना चाहिए। 'स्व की संकुचित सीमा से निकलकर 'पर के लिए अपने आपको बलिदान कर देना ही सच्ची मानवता है। यही सबसे बड़ा गुण है और यही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है। देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संवैधानिक मान्यता दी गई है, किन्तु प्रायः यह देखने में आता है कि इसकी आड़ में अराजक तत्व गैर जरूरी वातावरण उत्पन्न कर देते हैं, इससे राष्ट्र की छवि धूमिल होती है। सामाजिक बंधन मजबूत बंधन है और वह आत्म-चेतना के विकास के साथ ही गहरा जुड़ा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति की अपने और अपने हित की चिंता में दूसरों की तथा उनके हितों की मान्यता शामिल है और एक प्रकार के प्रयोजन के लिए उसका प्रयास, चाहे उदार हो या स्वार्थपूर्ण, उस हद तक दूसरे का भी प्रयास है। सभी अवस्थाओं में व्यक्ति के जीवन, हितों और प्रयोजनों के लिए सामाजिक संबंध का मूल महत्त्व है। यदि धर्म-परिवर्तन करने वाले के लिए कोई स्थान नहीं होगा, तो न तो धर्म-परिवर्तन के लिए कोई न्योता दिया जा सकता है और न ही उसे स्वीकार किया जा सकता है।

(यह लेखक के अपने विचार हैं, लेखक लेबर निगरानी ब्यूरो में उप-संपादक  है)

Dec 10, 2014


लोकप्रिय खेल फुटबॉल  
पादकन्दुक,सॉकर यह नाम शायद आपने नही शुना होगा, पर  दोस्तो यह दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल फुटवॉल का उपनाम है। जिसे समान्यतः कृत्रिम घास के मैदान में आप खेलते हैं। पैरो से खेला जाने वाला यह खेल आज काफी लोगो को पसंद आता है, वही बहुतो को यह खेल राश नही भी आता, जिन्हे यह खेल राश नही है, मैं उनसे कहना चाहुंगा  बस एक बार मैंदान में उतरो सच कहता हूं दोस्तो सारे खेल भूल जाओगे।
कब हुई खेल की शुरुआत
मध्य १९ वीं शताब्दी में व्यापक रूप से फुटबॉल के विभिन्न रूप के साथ इंग्लैंड के पब्लिक स्कूल में खेला गया था। इसकी शुरुआत यही से मानी जाती है, आधुनिक फुटबॉल को इंग्लैंड मे द फुटबॉल एसोसिएशन (फुटबॉल संघ)  के गठन के साथ कूटबद्ध किया गया और जिसके 1863 में बन लॉज़ ऑफ द गेम (खेल के कानून ) के आधार पर ही आज फुटबॉल खेली जाती है
अंतरराष्ट्रीय आधार पर फुटबॉल का नियंत्रण (फेडरेशन इंटरनेशनेल डी फुटबॉल एसोसिएशन) या एसोसिएशन फुटबॉल का अंतरराष्ट्रीय महासंघ जिसे संक्षेप में FIFA या फीफा कहा जाता है, करता है. फुटबॉल की सबसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय और लोकप्रिय प्रतियोगिता फीफी विश्व कप है, जिसका आयोजन हर चौथे वर्ष किया जाता है. इस प्रतियोगिता को व्यापक रूप से पूरे विश्व में देखा जाता है, और इसके दर्शक ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक खेलों को मिले दर्शकों से लगभग दुगने होते हैं। भारत में आज कलकत्ता ,गोवा जैसे बड़े शहरो को फुटबॉल खेल का गढ़ माना जाता है।
फुटवॉल कल और आज
आज फुटबॉल व्यवसायिक स्तर पर पुरी दुनिया में खेला जाता है.अपने पसंदीदा टीमों का  अनुकरण  करने के लिए लाखो लोग नियमित रूप से फुटबॉल मैदान जाते हैं ,। जबकि अरबों लोग टेलिविज़न  पर इस खेल को देखते हैं। लोगों कि एक बढ़ी संख्या अपने शौक के स्तर पर फुटबॉल खेलते हैं। आजकल फुटबॉल के खेल को चलाने वाली सबसे बड़ी संस्था फ़ीफ़ा है। यह संस्था हर चार वर्ष में फ़ुटबॉल की विश्वकप प्रतियोगिता आयोजित करती है। २००६ में आजकल १८वीं विश्वकप प्रतियोगिता खेली जा रही है। ब्राज़ील अभी तक सबसे ज़्यादा पांच बार यह प्रतियोगिता जीत चुका है।
फीफा आयोजित  एक सर्वेक्षण में तक़रीबन दो सौ देशों के दो सौ चालीस से भी ज्यादा लोग नियमित रूप से फुटबॉल खेलते हैं।
खेल के विशेष नियम
फुटवाल खेल दो टीमें के बीच खेला जाता है, प्रत्येक टीम में ११ खिलाड़ी होते हैं। इनमें से एक गोल कीपर होता है जिसको 'गोली' भी कहते हैं। खेल आयताकार मैदान में खेला जाता है जिसके दोनों सिरों पर गोल बने होते हैं। दोनों टीमों के खिलाड़ी एक गेंद को अपने पैरों से खेलते हुए विपक्षी टीम के गोल में डालने की कोशिश करते हैं। गोलरक्षक का काम गेंद को गोल में जाने से रोकना होता है। जब कोई टीम गेंद को विपक्ष के गोल में डालने में सफल हो जाती है तो कहा जाता है कि उस टीम ने एक 'गोल' कर दिया।
खेल ९० मिनट तक चलता है और जो टीम ज्यादा गोल करती है उसको विजयी घोषित किया जाता है। सभी खेलों की तरह फुटबॉल को खेलने के भी नियम हैं। गोलरक्षक के सिवा कोई भी खिलाड़ी गेंद को हाथ से नहीं छू सकता। गोल के तीन ओर एक रेखा बनी होती है, जिसे गोलरक्षक का क्षेत्र कहा जाता है। गोलरक्षक केवल इस क्षेत्र के अंदर रहते हुए ही गेंद को हाथ से छू सकता है। गेंद को पैरों या सिर से मार कर आगे बढ़ाया जाता है।
यदि गेंद गोल से लगी मैदान की सीमा रेखा से बाहर चली जाती है तो विपक्षी दल को 'कॉर्नर किक' दी जाती है। इसमें विपक्षी टीम का एक खिलाड़ी गेंद को मैदान के कोने से ठोकर मार कर वापस मैदान में लाता है। अगर गेंद किसी अन्य जगह से मैदान से बाहर जाती है तो विपक्षी खिलाड़ी गेंद को हाथों से अंदर फेंकता है। खेल को नियंत्रित करने के लिए एक रेफ़री मैदान में होता है। यदि कोई खिलाड़ी विपक्षी टीम के किसी खिलाड़ी को जानबूझ कर गिराता है तो रेफ़री इसे फ़ाउल करार देता है। वह फ़ाउल करने वाले खिलाड़ी को पीला या लाल कार्ड दिखाता है। पीले कार्ड का अर्थ चेतावनी होता हैदो बार पीला कार्ड दिखाए जाने पर खिलाड़ी को मैदान छोड़ना पड़ता है। लाल कार्ड गंभीर फ़ाउल के लिए होता है। जिस खिलाड़ी को एक भी लाल कार्ड दिखाया जाता है उसे मैदान छोड़ना पड़ता है।
गेंद मारना  विरोधी टीम के द्वारा गोल मारना या प्रत्येक अवधि का खेल शुरू करना
अन्दर फेंकना जब गेंद पुरी तरह से रेखा पार कर जाती है तब उस विरोधी टीम को इनाम मिलता जो गेंद अन्तिम बार छूता है।
गोल किक जब गेंद पुरी तरह गोल रेखा को पार कर जाती है गोल के बिना ही स्कोर होता है और हमलावर के द्वारा गेंद को अन्तिम बार छूने के कारण रक्षा करने वाली टीम को इनाम मिलता है।
कोर्नोर किक जब गेंद बिना गोल के ही गोल रेखा को पार कर जाती है और रक्षा करने वाली टीम के द्वारा गेंद को अन्तिम बार छूने के कारण हमलावर टीम को इनाम में मिलता  है।.
अप्रत्यक्ष मुफ्त किक गैर दंड फौल के रूप में विरोधी टीम को इनाम में मिलती है, जब कुछ तकनीकी अतिलंघन या प्रतिद्वंदी को बिना किसी विशेष फौल के बाहर भेज दिया जाए और खेल रुक जाए. अप्रत्यक्ष फ्री किक से सीधे गोल प्राप्त नहीं किया जा सकता
प्रत्यक्ष मुफ्त किक बेईमानी करने के कारण सूचीबद्ध दंड मिलती  है।
पेनाल्टी किक बैमानी करने के कारण प्रत्यक्ष मुफ्त किक मिलती है लेकिन पेनाल्टी क्षेत्र में बेईमानी करने के कारण विरोधी टीम को इनाम के रूप में पेनाल्टी किक मिलती है
ड्रोप गेंद जब रेफरी किसी अन्य कारण के लिए खेल को रोक दे जैसे खिलाड़ी को गंभीर चोट लगने से, बाहरी पार्टी के द्वारा हस्तक्षेप या गेंद का ख़राब हो जाने कि वजह से यह होता है व्यस्क खेलों में फिर से शुरू करना असामान्य है
खेल के पुरस्कार वह पुरस्कृत खिलाड़ी

आज कई खिलाड़ी हैं जिन्होने फुटवॉल से अपना परचम पूरे विश्व में लहराया हैं। सुनील  छेत्री   वर्ष 2011के एआइएफएफ प्लेयर ऑफ द ईयर चयनित किये गये जो आज भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान भी हैं, गौरमांगी सिंह वर्ष 2010 के सर्वश्रेष्ठ भारतीय फुटबॉलर में खिलाड़ी में सामिल किये गये। करनजीत सिंह, नरायण दास, बलवंत सिंह, मेहताब हुशैन आदि प्रमुख किलाड़यो में से एक हैं।

 

२०१४ फीफा विश्व कप पर एक नजर

२०१४ फीफा विश्व कप ( फीफा विश्व कप का 20 वां संस्कण ) 12 जून 2014 से 13 जुलाई 2014 के बीच ब्राज़ील में हुआ एक अंतर्राष्ट्रीय पुरूष फुटबॉल टूर्नामेंट था। 1950 के बाद, ब्राजील इस प्रतियोगिता में दूसरी बार मेज़बानी की। इसी के साथ मेक्सिको, इटली, फ्रांस और जर्मनी के बाद ब्राजील दो बार विश्व कप की मेजबानी करने वाला पांचवां देश बन गया है। साल 2014 का फीफा विश्व कप जर्मनी ने जीता।
बत्तीस देशों की टीमें फाइनल टूर्नामेंट में भाग लिया। सभी मैच ब्राजील के 12 विभिन्न शहरों में मैच खेले गए। अर्जेंटीना में आयोजित हुए 1978 विश्व कप के बाद से दक्षिण अमेरिका में आयोजित होने वाला यह पहला विश्व कप है। इससे पहले 2010 का टूर्नामेंट स्पेन ने जीता था , १३ जुलाई २०१४ को २०१४ फीफा विश्व कप के फाइनल में जर्मनी ने अर्जेण्टीना को अतिरिक्त समय के बाद 1-0 से पराजित किया, यह जर्मनी का चौथा खिताब है।
फुटबॉल मे कैरियर
युवा हमेशा राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के खिलाड़ी बनने का ख्‍वाब देखते हैं। लेकिन करोड़ों की जनसंख्‍या वाले देश में सैकड़ों को ही खेलों में देश का प्रतिनिधित्‍व करने का अवसर मिलता है। 
आप अंतरराष्‍ट्रीय या राष्‍ट्रीय स्‍तर पर फुटवॉल के खिलाड़ी बन सकते हैं।  इसलिए यदि खेल के प्रति समर्पण भाव है, देश के लिए खेलने की इच्‍छा है तो खेलों से पलायन करने की बजाय अपना नजरिया थोड़ा सा बदल लें। आप खेलों के प्रति समर्पित रहें, यदि अंतराराष्‍ट्रीय खिलाड़ी न भी बन पाएँ तब भी आपको फुटवॉल के क्षेत्र में ही करियर बनाने के अनेक विकल्‍प मिलेंगे। आप फुटवॉल खेल कर अपना वह अपने देश का नाम ऊचा कर सकते हैं।
फुटवॉल के स्टेडियम वह कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्व
दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, बहुत ही खूबसुरत फुटवॉल स्टेडियमो  में सुमार हैं, कई अन्य, स्टेडियम भी है जिन पर फुटवॉल मैच खेले जाते है, वह निम्न है, थुवुन्ना स्टेडियम, यांगून, म्यांमार, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, केरल  भारत, हलचौक स्टेडियम काठमांडू, नेपाल, दशरथ रंगासला स्टेडियम  काठमांडू, नेपाल, 20 इयर्स ऑफ इन्डीपेंडेंस स्टेडियम, खुजंद,ताजिकिस्तान, फतोर्दा स्टेडियम, गोवा, भारत, यह सब फुटवॉल के प्रमुख मैदानो में सुमार हैं
भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टी
भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ के द्वारा शासित है। 1948 से अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ फीफा द्वारा संबद्ध हो गयी। 1948 से भारतीय फुटबॉल महासंघ एशियाई फुटबॉल महासंघ के संस्थापक सदस्यों में है। भारतीय फुटबॉल टीम ने पहली और अंतिम बार 1950 में फीफा विश्व कप किया था परन्तु कुछ कारणों से वह इस प्रतियोगिता में हिस्सा न ले पाई।
 भारतीय टीम ने अब तक दो एशियाई खेलों में स्वर्ण तथा एएफसी एशिया कप में एक बार रजत जीता हैसबसे बड़ी जीत - भारत 7-0 सीलोन को मात दी थी बंगलोर, ( भारत  29 दिसंबर 1963 ) सबसे बडी हार - सोवियत संघ 11–1 भारत  (मास्को, सोवियत संघ; 16 सितम्बर 1955 ) को भारत की सबसे सर्मनाक हार हुई थी।

Dec 9, 2014


















दिल्ला आज तक समाचार,  क्रॉइम विभाग प्रमुख व ETV Group के क्रॉइम खबरों के संपादक सम्स ताहिर खान जी से भेटवार्ता के कुछ अंश ........
1 आपने अपनी शिक्षा कहां से पूर्ण की वह अनुभव कैसा था ?
मैंने अपनी शिक्षा दिल्ली के रामजस स्कूल से पूर्ण की इसके पश्चात, दिल्ली विश्वविद्लय से मैंने छह महीने का जर्नलिजम का डिपलोमा कोर्स किया।  उस समय पत्रकारिता के कोर्स बहोत कम ही हुआ करते थे। मैंने पत्रकीरिता की कोई विशेष पढ़ई नही की है। पर उस समय का अनुभव बहोत ही अच्छा था जो कुछ भी सीखा वह मेरे काम आया रहा है।
2 अपके जीवन में पत्रकारिता की शुरुआत कैसे हुई और आप एंकर कैसे बने?
कालेज से पढ़ाई पूरी करने के पश्चात 1993 - 094 में मैंने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। कॉलेज से निकलने के पश्चात मैंने स्टिंगर के तौर पर जनसत्ता ज्वाइन किया। मेरे पत्रकार बनने के पीछे दो चीजे हैं, मुझे क्रिकेट खेल का बहुत ही शौक था, खेल की रिर्पोटिंग करना खिलाड़ियो से मिलना आदि,।
दूसरा यह था मुझे बचपन से जासूस बनने का बड़ा शौक था, इस लिए मैंने क्राइम रिर्पोटिग को करना उचित समझा, क्योकि इसमे हर दिन कुछ नया होता है, तो जासूसी करने का मेंरा सपना भी पूरा हो रहा था। मै अपने आपको एंकर नही मानता हूं मै खुद को एक क्राइम रिर्पोटर मानता हूं क्योकि यह मेरा शौक है मैंने नौकरी समझ कर कभी अपने काम को नही किया। जो लोग इसे नौकरी समक्ष कर करेगे वह इसे नही कर पाऐगे। जो कुछ चैनल में होता हैं वह रिर्पोटर ही होता है।   
3 जीवन में आपके प्रेरणा स्रोत कौन हैं, और इस कामयाबी का राज क्या है?
मैंने प्रभात जोशी जी को लिखते देखा है, और राम बहादुर रॉय जी थे उनको लिखते देखा है, सुशील कुमार सिंह थे उनको देखा, मैंने इनके साथ रहकर बहोत कुछ सीखा और समझा यही मेरे गुरु और मेरे प्रेरणा स्रोत हैं, और कोई राज नही हैं। जो अपने कार्य के प्रति सच्ची निष्ठा रखता हैं, और हर कार्य को जिम्मेदारी पूर्वक करता है, वह कामयाब हो जाता है।
4 आप रिपोर्टिग और एंकरिग मे से किसे बेहतर मानते हैं और क्यो?
दोनो माध्यमो का काम लगभग एक जैसा ही होता है। पर अच्छा एंकर वही बन सकता है, जिसके पास तह की भरपूर्ण जानकारी है। अगर एक रिर्पोटर एंकर बनता है, तो वह काफी अच्छी तरह से चीजो को समझता है। और फिर वह काफी अच्छी एंकरिग कर सकता है। एक अच्छा एंकर तब तक अच्छा एंकर नही बन सकता है, जबतक वह अच्छा रिर्पोटर नही बनता। एक एंकर को हर चीज की जानकारी होनी चाहिए चाहे वह उसके पसंद की हो यह ना हो पर पता अवश्य होनी चाहिए। अगर जमीनी जानकारी सही नही हैं तो एक अच्छा एंकर बनना नामुकिंन है।
5 अपराध रिपोर्टिग के दौरान किन- किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता हैं?
यह सब बाते किताबी है, मै समझता हूं की कोई चुनौंती और चैलेंज नहीं हैं, आपको एक स्टोरी करनी होती है, जो दूसरे के जिंदगी से जुड़ी हुई भी हो सकती  है। इस लिए आपको बहोत सजग होकर हर कदम चलना पडता है। क्राईम रिर्पोटिग में स्रोत से मिली खबरो को बहोत ही बारीकी से जॉंचना चाहिए। घटना की रिर्पोट को सही ढ़ग से प्रस्तुत करने की प्रकिया मालुम होनी चाहिए। अपराध पत्रकारिता में आपको आए दिन तरह–तरह की धमकिया मिलती रहती है, पर आपको डरने की जरुरत नही है। एक क्राइम रिर्पोटर अपनी जान हथेली पर रख कर चलता है। कहा गया है ना, मुद्दाए लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूरे खुदा होता।
6 अपने पत्रकारिता जीवन की ऐसी किसी यागगार घटना या अनुभव के बारे मे बताएं जिसे बहोत सराहा गया हो या जिसे आप अपने जीवन में मील का पत्थर मानते हो ?
जब 2001  मैंने जुर्म प्रोगाम की शुरुआत की, तब  यह टेलीवीजन का पहला  एक साप्ताहिक प्रोग्राम था। शायद किसी ने सोचा नही था कि न्यूज चैनल पर एक आधे घंण्टे का शो आएगा। पर इसमे चैलेंज यह था कि दिखाये तो क्या, तब मुझे सोच आई कि इसमे वह जुर्म दिखाया जाए जो थोड़ा हटकर हो .उदाहरण स्वारुप राजस्थान में एक गांव जहां लोग जब काम करने जाते हैं, तब अपनी पत्नियों को कमरे में बद करके ताला लगा देते हैं। जब मैने इस तरह की सनसनी खेज स्टोरिया की तब मुझे बहुत सराहा गया। इस तरह की खबरो को जब कोई भी सुनता हैं , तो   अवश्य चकित जाता हैं । जब इसकी शुरुआत की तब जुर्म देश में देखा जाने वाला नंबर वन प्रोग्रम था। बाद में कई चैनलो ने इसकी शुरुआत की और आज तो जैसे बाढ़ ही आ गई हो।  
7 अपराध समाचारो की दुनिया मे दिन-रात व्यस्त रहने वाले एंकर और रिपोर्टर क्या अपने परिवार के लिए समय निकाल पाते हैं?
नही यही तो दुःख है, समय की व्यस्तता इतनी अत्यधिक होती है की पता नही चलता कब दिन हुआ और कब रात, समय की व्यस्तता के कारण समय निकालना काफी मुशकिल होता है। पत्रकारिता की नौकरी 24 घण्टे 7 दिनो की होती है, इसमें आप कभी खाली नही होते। समय की अत्यधिक व्यस्तता के कारण घर पर समय दे पाना अत्यधिक मुशकिल होता है।
8 माना जाता है कि देश के अन्य राज्यो के मुकाबले एनसीआर में होने वाले अपराध के समाचारो की अधिक प्राथमिकता मिलती है ऐसा क्यों?
क्योकि यहां की घटना को लोग देखना पसंद करते हैं, और जो चीजे आज लोग देखना चाहते हैं चैनल वही दिखाता है।  दमदार खबरे वही होती है जो लोगो को चौका दे, यह कारण है की मैट्रो शहरो की खबरो को ज्यादा दिखाया जाता है। एनसीआर की खबरे बहोत ही महत्तवपूर्ण होती है, क्योकि यहा की सारी खबरे  भारत की राजधानी से जुड़ी होती हैं। आज हर कोई यहा की खबरो को देखना पसंद कर रहे हैं। चाहे वह अपराध से जुड़ी हो यह फिर किसी अन्य चीजो से,  यही कारण है कि, अन्य राज्यो के मुकाबले एनसीआर की खबरो को ज्यादा दिखाया जाता है।  
9 लोग कहते है कि टीवी पर अपराध दिखाने से जागरुकता कम फैलती है और अपराध अधिक बढ़ता है इसपर आपका क्या कहना है?
नही मै बिलकुल नही मानता कि सिर्फ चैनल पर दिखाने से अपराध बढ़ता है। मै मानता हूं की कुछ लोग नकल करते हैं, और जुर्म को अंजाम देते है। पर यह बहुत कम हद तक ही सही है। जब हम अपराध से जुड़ी खबरो को दिखाते है, तो कही ना कही हम कई लोगो को शर्तक भी करते हैं। लोगो को हम दिखाते हैं की चोर इस तरह से घर में घुस सकता है, और कई अन्य तरह की अपराध से जुड़ी महत्वपर्ण घटनाओ को हम दिखाते हैं, प्रोग्रामो को लोग देखते हैं और नशीहत लेते हैं। 
10 हमारे देश मे वक्त –बेवक्त अपराध होते हैं इस पर लम्बे समय तक रिपोर्टिग और एंकरिग करना मुशकिल काम है आप कैसे कर लेते हैं ?
बात पैशन की होती है, अगर कोई नौकरी समझ कर इसे करना चाहता है तो वह बिलकुल नही कर पाएगा। अगर अपराध रिर्पोटिंग आपका पैशन है जुनून है तो ही आप इस फील्ड में कदम रखे। हर फील्ड मे लोग अपना–अपना काम करते हैं, उसी तरह से क्राइम रिर्पोटिंग भी है। क्राइम की खूबसूरती यह है की इसमें आपको नए लोग मिलते हैं नये जगह मिलते हैं वह नये विचार मिलते हैं, यही वजह है कि लोग क्राइम के प्रोग्रामो को देखते वह पसंद करते हैं। अपराध से जुड़ी खबरो पर काम करना उन्हे दर्शको के बीच अच्छी तरह से प्रस्तुत करना मेरा शौक है।

11 आज के अधिकांश विद्धी टीवी रिपोर्टिर या एंकर बनना चाहते हैं इसके लिए उन्हे क्या तैयारी करनी चाहिए?
अभी तक जो मेंरा अनुभव है, टेलीवीजन में सीखने के लिए कुछ नही है। मैं टीवी 3 दिनो में सिखा सकता हूं और दावा करता हूं कि चौथे दिन सीखने के लिए कुछ नही बचेगा। स्क्रिपटिंग और दूसरी खबरो की समझ यह दो चीजे जिसे मैं शायद तीस साल मे भी नही सिखा पाऊ, स्क्रिपटिंग ना तो क्लाश में नही सिखाई जा सकती इसे आपको खुद सीखना होता है। आज चैनल को कुछ नया चाहिए कुछ नया लेकर आओगे तभी वेलकम है। अगर सब में और आपमें कोई अंतर नही होगा तो कोई आपको क्यो लेगा। इस लिए मै कहना चाहूंगा कि कुछ नया और वेहतर करने के प्रयास में हमेसा लगे रहे सफलता जरुर मिलेगी।
12 अपराध पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना करियर बनाने की इच्छा रखने वाले विद्दथीयो को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

अपराध पत्रकारिता में करियर बनाने के लिए अच्छी छवि की जरुरत है। एक रिर्पोटर को अपनी छवि बनाने में सालो लग जाता है, और तोड़ने में एक दो  स्टोरी काफी है। आप कितने अच्छे रिर्पोटर हैं, यह आपकी स्टोरी पर निर्भर करता है। घटना के दर्द को व्यक्त करने के लिए आपके पास शाब्द होने चाहिए। घटना की तह तक जाकर बारीकी से घटना के बारे में सही वह रोचक चीजे निकालनी होती हैं। अपराध पत्रकारिता में सबसे जरुरी है, कि जिस घटना पर आप रिर्पोर्ट कर रहे हैं, उसके रिर्पोर्ट सत प्रतिशत सही होने चाहिए, सूत्रो से मिली जानकारियों को टटोलना चाहिए। पुराने जमाने में पुलिस वाले कहते, कि अपने बाप पर भी शक करो। उसी तरह एक क्राईम रिर्पोटर का सिर्फ एक लाइन होना चाहिए कि, शक पर भी शक करो.. अगर ऐसा करते हो तो कभी मार नही खाओगे। ............
भारत का राष्ट्रिय खेल हॉकी

प्राचीनतम खेल है हॉकी। हॉकी में एक समय हमारे भारत की धाक थी, परंतु अब ऐसा नही है। आज भले ही हॉकी भारत देश का राष्ट्रीय खेल हो परन्तु आज इस खेल में ऑस्‍ट्रेलिया, जर्मनी स्पेन, हॉलैड जैसी टीमों ने अपनी धाक जमा रखी है। प्रचीतंम लाठी (जटटक) व रबर या कठोर प्लास्टक की गेंद से खेला जाने वाल एक मात्र खेल होने के कारण आज भी लोग इस खेल बहुत चाव से खेलते हैं।
खेल की शुरुआत
हॉकी खेल का उद्गम सदा से ही विवाद का विषय रहा है। एक मत के अनुसार ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व हॉकी का खेल फारस में खेला जाता था। यह खेल  आधुनिक हॉकी से भिन्न था। कुछ समय बाद यह खेल परिवर्तित होकर युनान  ( वर्तमान ग्रीस) पहुंचा जहा यह इतना प्रचलित हुआ कि यह युनान की ओलंपिक प्रतियोगिता में खेला जाने लगा। धीरे-धीरे रोमवासियो में भी इस खेल के प्रति  इतना रुझान बढा की रोम के युनान  ओलंपिक में इसे खेल जाने लगा। हॉकी की शुरुआत आरंभिक सभ्यताओ के युग से मानी जाती है। हॉकी खेलने के अरबी, यहरदी, र्फारसी और रोमन तरीके रहे और दक्षिण अमेरिका के एज़टेक इंडियनों द्वारा छडी से खेला जाने वाला एक खेल के प्रमाण भी मिलते हैं।  आरंभिक खेलों हलिंग और शिंटी जैसे खेलों के रूप में भी हॉकी को पहचाना गया है। मध्य काल में छडी से खेला जाने वाला एक फॉसीसी खेल हॉकी  की उत्पति शायद इसी से हुई है
19 वी शताब्दी के प्रारंभिक वषों में भारत में इस खेल के विस्तार हुआ , जिसक श्रेय मुख्य रूप से ब्रिटेश सेना को जाता है। आधुनिक युग में पहली बार ओलंपिक में हॉकी 29 अक्तूबर, 1908 में लंदन में खेली गई । इसमें छह टीमें थीं ।1924  में ओलपिंक में अंतर्राष्ट्रीय कारणों से यह खेल शामिल नहीं हो सका। ओलंपिक से हॉकी के बाहर हो जाने के बाद जनवरी, 1924 में अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन) की स्थापना हुई। हॉकी का खेल एशिया में भारत में सबसे पहले खेला गया। पहले दो एशियाई खेलों में भारत को खेलने का अवसर नहीं मिल सका, किन्तु तीसरे एशियाई खेलों में भारत को पहली बार ये अवसर हाथ लगा। हॉकी में भारत का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है।  भारत ने हॉकी में अब तक ओलंपिक में आठ स्वर्ण, एक और दो कांस्य पदक जीते हैं।
भारत में हॉकी
भारत में यह खेल सबसे पहले कलकत्ता में खेला गया । भारत टीम का  सर्वप्रथम वहीं संगठन हुआ। 26 मई को सन् 1928 में भारतीय हाकी टीम प्रथम बार ओलिम्पिक खेलों में सम्मिलित हुई और विजय प्राप्त की। 1932 में लॉस एंजेलिस ओलम्पिक में जब भारतीयों ने मेज़बान टीम को 24-1 से हराया। तब से अब तक की सर्वाधिक अंतर से जीत का कीर्तिमान भी स्थापित हो गया। 24 में से 9 गोल दी भाइयों ने किए, रूपसिंह ने 11 गोल दागे औरध्यानचंद ने शेष गोल किए।
1936 के बर्लिन ओलम्पिक में इन भाइयों के नेतृत्व में भारतीय दल ने पुनः स्वर्ण 'पदक जीता' जब उन्होंने जर्मनी को हराया। बर्लिन ओलम्पिक में ध्यानचंद असमय बाहर हो गये और द्वितीय विश्व युद्ध ने भी इस विश्व स्पर्द्धा को बाधित कर दिया। आठ वर्ष के बाद ओलम्पिक की पुनः वापसी पर भारत की विश्व हॉकी चैंपियन की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। एक असाधारण कार्य, जो विश्व में कोई भी अब तक दुहरा नहीं पाया है। अन्य टीमों के उभरने के संकेत सर्वप्रथम मेलबोर्न में दिखाई दिए, जब भारत को पहली बार स्वर्ण पदक के लिए संधर्ष करना पड़ा।
हॉकी ओलम्पिक में भारत का प्रदर्शन
हॉकी के खेल में भारत ने हमेशा विजय पाई है। इस स्‍वर्ण युग के दौरान भारत ने 24 ओलम्पिक मैच खेले और सभी 24 मैचों में जीत कर 178 गोल बनाए तथा केवल 7 गोल छोड़े। भारत के पास 8 ओलम्पिक स्‍वर्ण पदकों का उत्‍कृष्‍ट रिकॉर्ड है। भारतीय हॉकी का स्‍वर्णिम युग 1928-56 तक था जब भारतीय हॉकी दल ने लगातार 6 ओलम्पिक स्‍वर्ण पदक प्राप्‍त किए। 1928 तक हॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल बन गई थी और इसी वर्ष एमस्टर्डम ओलम्पिक में भारतीय टीम पहली बार प्रतियोगिता में शामिल हुई। भारतीय टीम ने पांच मुक़ाबलों में एक भी गोल दिए बगैर स्वर्ण पदक जीता। जयपाल सिंह की कप्तानी में टीम ने, जिसमें महान खिलाड़ी ध्यानचंद भी शामिल थे , अंतिम मुक़ाबले में हॉलैंड को आसानी से हराकर स्वर्ण पदक जीता।
भारतीय हॉकी संघ के इतिहास की शुरुआत ओलम्पिक में अपनी स्‍वर्ण गाथा शुरू करने के लिए की गई। इस गाथा की शुरुआत एमस्‍टर्डम में 1928 में हुई और भारत लगातार लॉस एंजेलस में 1932 के दौरान तथा बर्लिन में 1936 के दौरान जीतता गया और इस प्रकार उसने ओलम्पिक में स्‍वर्ण पदकों की हैटट्रिक प्राप्‍त की।
खेलने के नियम
यह खेल चौकोर मदैान पर 11 खिलाडियों वाले दो दलों के बीच खेला जाता है। यह मैदान 91.4 मीटर लंबा और 55 मीटर चौडा होताहै , इसके केंद्र में एक केंद्रीय रेखा व 22.8 मीटर की दो अन्य रेखाएँ खिची होती हैं। गोल की चौडाई 3.66 मीटर व ऊँचाई 2.13 मीटर होती है। सामान्य खेल संयोजन में पांच खिलाड़ी फॉरवर्ड, तीन हाफबैक, दो फुलबैक और एक गोलकीपर होते हैं।
एक खेल में 35 मिनट के दो भाग होते है, जिनमें 5 से 10 मिनट का अंतराल होता है । गोलकीपर 30 गज़ के घेरे (डी) में गेंद को पैर से मारने अथवा उसे पैरों या शरीर की मदद से रोकने की इजाज़त होती है। अन्य सभी खिलाड़ी गेंद को केवल स्टिक से ही रोक सकते हैं। मैदान के केंद्र से पास-बैक द्वारा, जिसमें एक खिलाड़ी अपनी टीम के अन्य खिलाड़ीयों की ओर गेंद फेंकता है, गेंद पुनः उस तक पहुँचाई जाती है , खेल प्रारंभ होता है। किसी को चोट लगने पर या तकनीकी कारण से खेल रुकने पर, दोनों दलों द्वारा क्रमशः एक-एक पेनल्टी करने पर या खिलाड़ीयों के कपड़ों में गेंद के उलझने पर खेल को फिर से शुरू करने के लिए फ़ेस-ऑफ़ या बुली का प्रयोग किया जाता है।
फ़ेसऑफ़ में दोनों टीमों के एक-एक खिलाड़ी आमनेसामने खड़े होते है और गेंद उनके बीच मैदान पर होती है। एक के बाद एक ज़मीन पर आघात करने के बाद दोनों खिलाड़ी एक-दूसरे की स्टिक को आपस में तीन बार टकराते हैं, प्रत्येक खिलाड़ी गेंद को मारने का प्रयास करता है और इस प्रकार खेल फिर से शुरू हो जाता है। गेंद के मैदान से बाहर जाने की दशा में खेल को फिर से शुरू करने के विभिन्न तरिके हैं। गेंद से खेलते वक़्त हॉकी को कंधों से ऊपर उठाना नियमों के विरुद्ध होता है। गेंद को हॉकी से रोकना उसी तरह की ग़लती है, जैसे गेंद को शरीर या पैरों से रोकना।
अंडरकटिंग के साथ ही विरोधी की हॉकी में अपनी हॉकी फंसाकर (हुकिंग) गेंद को तेज़ी से ऊपर उछालते हुए खेल को ख़तरनाक बनाना भी ग़लत है। अंत में अवरोधन का नियम है।  एक खिलाड़ी को अपनी स्टिक या शरीर के किसी भी भाग को अपने विरोधी और गेंद के बीच लाकर अवरोध खड़ा करने अथवा विरोधी व गंद के बीच दौड़कर बाधा डालने की अनुमति नहीं होती है। अधिकतर ग़लतियों की सजा विरोधी दल को , जिस स्थान पर नियम तोड़ा गया,  वहाँ से एक फ़्री हिट के रूप में दी जाती है। खेल के प्रत्येक भाग के लिए एक निर्णायक ( रेफ्री )होता है।
गेंद - हॉकी में इस्तेमाल होने वली यह गेंद मूलतः क्रिकेट की गेंद थी,  लेकिन प्लास्टिक की गेंद भी अनुमोदित है। इसकी परिधि लगभग 30 सेमी होती है।
हॉकी स्टिक- हॉकी स्टिक लगभग एक मीटर लंबी और 340 से 790 ग्राम होती है। स्टिक का चपटा छोर ही गेंद को मारने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
महिला हॉकी
विक्टोरियाई युग में खेलों में महिलाओं पर प्रतिबंध होने के बावजूद महिलाओं में हॉकी की लोकप्रियता बहुत बढ़ी। यद्यपि 1895 से ही महिला टीमें नियमित रूप से मैत्री प्रतियोगिताओं में भाग लेती रही , लेकिन गंभीर अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की शुरुआत 1970 के दशक तक नहीं हुई थी। 1974 में हॉकी का पहला महिला विश्व कप आयोजित किया गया और 1980 में महिला हॉकी ओलम्पिक में शामिल की गई। 1927 में अंतर्राष्ट्रीय नियामक संस्था,  इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ विमॅन्स हॉकी एसोसिएशन का निर्माण हुआ था। 1901 में अमेरिका में कांसटेंस एम.के. एप्पेलबी द्वारा इस खेल की शुरुआत हुई और मैदानी हॉकी धीरे-धीरे यहाँ की महिलाओं में लोकप्रिय मैदानी टीम खेल बन गई व विद्यालयों , महाविद्यालयों तथा क्लबों में खेली जाने लगी।
खेल के माने जाने खिलाड़ी वह पुरस्कार 
मेजर ध्यानचंद जिन्होने हॉकी खेल के प्रति ना सिर्फ अपना सब कुछ अप्रित कर दिया बल्कि भारत के लिए कई ऐसे रिकार्ड बनाये जो भारत के लिए एक सपना था।
उन्हें १९५६ में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान  पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। उनका जन्म 29 अगस्त, 1905 इलाहाबाद, संयुक्त प्रांत, ब्रिटिश भारत में हुआ था। उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है । इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। कई अन्य खिलाड़ी भी हैं ,जिन्होने हॉकी में अपना नाम किया है जिनमें से धनराज पिल्ले , केडी सिंह बाबू , बलबीर सिंह, मनप्रीत आदि प्रमुख किलाड़ी हैं।
कैरियर
भारत ने ओलंपिक हॉकी में लगातार छह बार स्वर्ण पदक (1928-1956) जीता है। घरेलू स्तर पर कई टूर्नामेंट भी आयोजित किए जाते हैं। इसमेंध्यानचंद्र टूर्नामेंट भी शामिल हैं। भले ही भारतीय हॉकी की स्थिति अभी कुछ ठीक न हो, लेकिन आने वाले दिनों इसकी तस्वीर बदल सकती है। आज आप चाहें किसी भी खेल से क्यों न जुड़े हों, यदि आप चैम्पियन हैं, तो आप पर पैसों की बरसात हो सकती हैं। इसका हालिया उदाहरण है अभिनव बिंद्रा, जिनपर आज करोड़ों रुपये की बरसात हो रही है। साथ ही, कई पुरस्कारों से भी नवाजा जा रहा है। मेहनत करके आप इस खेल में अपना करियर आसानी से बना सकते हैं।