Mar 24, 2015


और कितने टुकडे होगें भारत के..... ?

आशीष शुक्ला
24-3-2015
आज भारत को आजाद हुए लगभग सात दशक होने को हैं, परन्तु आज भी न तो वह आजाद है, और ना ही उसके टुकडे होने बंद हुए हैं। भारत की इस पावन धरती पर, ना सिर्फ बटवारा आज जोरो से हो रहा है, बल्कि समाज मे जातिगत-भेदभाव के आधार पर लगातार बटवारा होता आया है, वह आज भी हो रहा है। फिर एक राष्ट्र कैसे विकास करेगा? विकास तभी संभव है, जब समाज मे जातिगत भेदभाव ना हो, परन्तु भारत सदैव से ही इसका शिकार होता आया है, जिसके चलते वह विकास नही कर पाया और अगर समाज मे इसी तरह के जातिगत- भेदभाव लगातार होते रहे तो भारत कभी भी विकास नही कर पाएगा।
कहते हैं कि इंसान देखने और सुनने से समक्षता है, परन्तु भारत ना तो देखने से समझ रहा, और ना ही सुनने से, हलांकि इसमे इसका कोई दोष नहीं है। भारत मे मौजूद समाज के लोगों ने इसे अंधा बना दिया है। जब हमारे यहा कोई अमेरिका का नागरिक आता है, और जब हम उसका परिचय पूछते हैं तो, अमेरिकन बताएगा। ना कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, या इसाई। अगर हम बाहर जाते हैं, और कोई हमसे हमारा परिचय पूछता है तो, हम अपना परिचय जातिगत तरीके से देते हैं। समाज मे सदियों से पिछड़े वर्गों के साथ-लगातार अन्याय होता आया है, और गतिवत आज भी हो रहा है। हर किसी को जीने का अधिकार है, हर किसी को अपना मत रखने का अधिकार है, परन्तु जिस तरह से आज भारत पर जातिवाद हावी है, इससे ना तो पिछडा वर्ग कुछ बोल पाता है, और ना ही अपने आपको लोगों के समक्ष उठने का मौका पाता है।
क्या शिक्षा जाति को समाप्त कर सकती है? शिक्षा जाति को समाप्त कर भी सकती है और नहीं भी। जो शिक्षा आजकल दी जा रही है, अगर वही शिक्षा है, तो वह जाति पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। जाति वैसी ही बनी रहेगी। इसका श्रेष्ठ उदाहरण ब्राह्मण जाति है। उनके अनुसार, ‘यह वह जाति है, जो शत-प्रतिशत शिक्षित है, बल्कि इसका बहुमत उच्च शिक्षितों का है। किंतु अभी तक एक भी ब्राह्मण ने स्वयं को जाति के विरुद्ध घोषित नहीं किया है। यह एक कडवा सच है कि क्षत्रिय और ब्राह्राणों ने सबसे ज्यादा दलितों का शोषण किया है। और जातिवाद को बढावा दिया है। जातिवाद ना जाने का एक कारण आरक्षण भी है, खास तौर से राजनैतिक आरक्षण। क्योंकि जातिविहीन और वर्ग- विहीन समाज के लिए नेतृत्व करने वाले बौद्धिक वर्ग को राजनैतिक आरक्षण ने निष्क्रिय बना दिया है। दूसरी ओर नौकरियों में आरक्षण ने जिस मध्यवर्ग को दलितों में विकसित किया है, उसकी सारी भागदौड़ अब उच्च वर्ग बनने की दिशा में है। जातिप्रथा ने हमें सिर्फ बर्बाद ही किया है। बुद्धिमान लोगो को तो इन जातिवादी शिक्षा के गढ़ों काशी, कांची, तिरुपति आदि के सारे पाखंडी, मक्कार, धूर्त जातिवादियों से ये सवाल करना चाहिए की ये सब बताएं की उस गुप्त ज्ञान से जो इन्हें इनका महान और दैवीय जन्म होने से भगवान से तोहफे में मिला था, इन्होने कौन सी महत्वपूर्ण खोज भारत देश और समाज की दी है? इन जात-पात के लम्पट ठेकेदारों ने इन सब विश्वप्रसिद्ध संस्थानों की महान वैज्ञानिक परंपरा का स्तर मिटटी में मिलाकर अपने घटिया किस्म की हथकंडे, तिकड़मबाजी और चालबाजी से इन्हें अपनी दक्षिणा का अड्डा बनाकर छोड़ दिया है। निष्पक्ष सोचने से पता चलेगा कि हमसे कहीं कम गुणी अंग्रेज सिर्फ हम पर ही नहीं लगभग आधी दुनिया पर केवल इसी वज़ह से राज कर पाए, कि उन्होंने अपने समाज के अन्दर नकली और घटिया भेदभाव को बिलकुल नकार दिया। और वो हमारे ढोंगी पंडो जैसे लोगों के चक्कर में नहीं पड़े। समाज मे संतुलन का आधार ज्ञान, धन और बल होता है। अगर ये तीनों किसी एक के हाथ मे केन्द्रित हो जाए तो समाज मे असंतुलन पैदा हो जाता है। इसी ज्ञान को आधार मानकर महान ऋषियों ने समाज को चार वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) मे बांटा था। जातिवाद जैसी समस्या भारतीय समाज की एक ऐसी पहचान बन चुकी है, जिसे कई वर्षों के प्रयत्नों और शिक्षा के प्रसार-प्रचार के बावजूद मिटा पाना असंभव सा हो गया है। संविधान के अनुसार भारत के किसी भी निवासी के साथ जाति के नाम पर भेदभाव नहीं किया जाएगा और अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो, उसे दंड दिया जाएगा। लेकिन संविधान का यह निर्देश मात्र एक अनुच्छेद बनकर ही रह गया और जाति प्रथा का स्वरूप दिनों-दिन घिनौना होता चला गया। आज यह एक ऐसे रूप में अपना सिर उठाए खड़ा है, जो मॉडर्न होते भारतीय समाज की दोहरी मानसिकता को साफ प्रदर्शित कर रहा है।
A.s Raja

( यह लेखक के अपने विचार हैं, लेखक युवा पत्रकार है) 

Mar 21, 2015

गीता से
(यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभि-उत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम् । परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्-कृताम्, धर्म-संस्थापन-अर्थाय सम्भवामि युगे युगे ।)(टिप्पणीः श्रीमद्भगवद्गीता वस्तुतः महाकाव्य महाभारत के भीष्मपर्व का एक अंश है; इसके १८ अध्याय भीष्मपर्व के क्रमशः अध्याय २५ से ४२ हैं ।)
भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।
मैं नहीं जानता कि ईश्वर होता है कि नहीं । जब कोई मुझसे पूछता है तो मेरा उत्तर स्पष्टतः अज्ञान का होता है, यानी साफ तौर पर मैं नहीं जानता ।हो सकता है ईश्वर हो । अथवा हो सकता है वह न हो और हम सदियों से उसके अस्तित्व का भ्रम पाले हुए हों । कोई भी व्यक्ति उसके अस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर सकता है, और न ही उसके अनस्तित्वको । ऐसे प्रश्नों के संदर्भ में अपनी अनभिज्ञता जताना मेरी वैज्ञानिक सोच के अनुरूप है ।
जब ईश्वर के बारे में निश्चित धारणा ही न बन सकी हो तो श्रीकृष्ण के ईश्वरावतार होने-न-होने के बारे में भला क्या कहा जा सकता है ? ऐसी स्थिति में मैं युग-युग में जन्म लेता हूं ।कथन कितना सार्थक कहा जाऐगा ? लेकिन मान लेता हूं कि महाभारत का युद्ध हुआ था, उसमें भगवदावतार श्रीकृष्ण की गंभीर भूमिका थी, और उन्होंने अपने हथियार डालने को उद्यत अर्जुन को धर्मयुद्धलड़ने को प्रेरित किया । उन्होंने युद्धक्षेत्र में जो कुछ कहा क्या वह अर्जुन को युद्धार्थ प्रेरित करने भर के लिए था या उसके आगे वह एक सत्य का प्रतिपादन भी था ? दूसरे शब्दों में, उपर्युक्त दोनों श्लोकों में जो कहा गया है वह श्रीकृष्ण का वास्तविक मंतव्य था, या वह उस विशेष अवसर पर अर्जुन को भ्रमित रखने के उद्येश्य से था । जब मैं गंभीरता से चिंतन करता हूं तो मुझे यही लगता है कि ईश्वर धर्म की स्थापना के लिए पुनः-पुनः जन्म नहीं लेता है ! कैसे ? बताता हूं ।
मान्यता है कि महाभारत का युद्ध द्वापर युग के अंत में हुआ था । उसी के बाद कलियुग का आरंभ हुआ । चारों युगों में इसी युग को सर्वाधिक पाप का युग बताया जाता है । सद्व्यवहार एवं पुण्य का लोप होना इस युग की खासियत मानी जाती है । कहा जाता है पापकर्म की पराकाष्ठा के बाद फिर काल उल्टा खेल खेलेगा और युग परिवर्तन होगा । मैं बता नहीं सकता हूं कि कलियुग के पूर्ववर्ती सैकड़ों-हजारों वर्षों तक स्थिति कितनी शोचनीय थी, धर्म का ह्रास किस गति से हो रहा था, किंतु अपने जीवन में जो मैंने अनुभव किया है वह अवश्य ही निराशाप्रद रहा है । समाज में चारित्रिक पतन लगातार देखता आया हूं । देखता हूं कि लोग अधिकाधिक स्वार्थी होते जा रहे हैं और निजी स्वतंत्रता के नाम पर मर्यादाएं भंग करने में नहीं हिचक रहे हैं । सदाचरण वैयक्तिक कमजोरी के तौर पर देखा जाने लगा है । बहुत कुछ और भी हो रहा है ।
इस दशा में मेरे मन में प्रश्न उठता है कि श्रीकृष्ण के उपर्युक्त कथनों के अनुसार तो उन्हें धर्म की स्थापना करने में सफल होना चाहिए था, तदनुसार अपने पीछे उन्हें एक धर्मनिष्ठ समाज छोड़ जाना चाहिए था । लेकिन हुआ तो इसका उल्टा ही । महाभारत की युद्धोपरांत कथा है कि कौरव-पांडवों का ही विनाश नहीं हुआ, अपितु श्रीकृष्ण के अपने वृष्णिवंशीय यादवों का भी नाश हुआ । सामर्थ्यवान्श्रीकृष्ण स्थिति को संभालने में असमर्थ सिद्ध हुए थे । अंत में निराश होकर उन्होंने अपने दायित्व अर्जुन को सौंप दिए और अग्रज बलभद्र के साथ वन में तपस्वी का जीवन बिताने चले गये । वहीं एक व्याध के हाथों उनकी मृत्यु हुई थी ।


(भूमि अधिग्रहण)

ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना संशोधन बिल को राज्यसभा में पेश करने का विचार तब तक के लिए टाल दिया है जब तक कि वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी से संबंधित विधेयक न पारित हो जाए। सरकार को उम्मीद है कि जीएसटी से संबंधित बिल कम जटिल होने के कारण पारित हो सकता है। वैसे भी इसके मूल बिल का प्रारूप संप्रग सरकार ने तैयार किया था और अगर च्यादा नहीं तो यह बिल भी भूमि अधिग्रहण विधेयक जितना ही महत्वपूर्ण है।
        भूमि अधिग्रहण बिल को फिलहाल टालने से भाजपा को प्रस्तावित संशोधनों के पक्ष में सहमति वाला जमीनी आधार तैयार करने के लिए अधिक समय मिल जाएगा। यह काम काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि किसानों के मन में विश्वास का भाव कैसे भरा जाता है, जिनके साथ पिछली सरकारों ने खराब बर्ताव किया है।
        यह मेरे लिए एक रहस्य ही है कि क्यों भाजपा नेतृत्व ने सुधारों की पहली कड़ी के रूप में भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन करने को अपनी प्राथमिकता बनाया, जबकि उसे अच्छी तरह पता था कि आम चुनावों के पहले इस मसले पर कितनी संवेदनशीलता थी। शायद इस हड़बड़ी का कारण वरिष्ठ नौकरशाह थे जो औद्योगिक कोरिडोर तथा बुनियादी ढांचे से जुड़ी दूसरी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की जल्दी में थे।
 यह भी हो सकता है कि भाजपा ने इन खबरों को भी सही रूप में नहीं लिया कि संप्रग सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री अर्थव्यवस्था की कीमत पर जयराम रमेश की राजनीतिक बढ़त लेने की चाह के विरोधी थे। अटकलों के मुताबिक उनमें से कुछ ने अपना विरोध खुले रूप में जताया और कुछ ने गोपनीय तरीके से। यह भी हो सकता है कि दिल्ली के चुनावों के पहले भाजपा में उभरी आरामतलबी ने भी कुछ असर किया हो। मैंने खुद दिसंबर में भाजपा के जश्न वाले मूड को करीब से देखा था। पार्टी के लिए अब यह साफ हो जाना चाहिए कि यह एक गलती थी। इस समय विपक्षी दलों में से
अधिकांश अपनी अवसरवादिता के कारण ही सही, लेकिन इस एक मुद्दे पर एक दूसरे के करीब आ गए हैं फिर चाहे वह तृणमूल कांग्रेस से लेकर माकपा हो अथवा कांग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी। यह आश्चर्यजनक है कि मोदी सरकार ने यह कैसे सोच लिया कि वह 2013 में संप्रग सरकार द्वारा बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून की खामियों को उभारकर इस मसले को एक प्रशासनिक मुद्दे की तरह हल करने में कामयाब हो जाएगी? निश्चित ही सोनिया गांधी के नेतृत्व में 14 राजनीतिक दलों का संयुक्त मार्च एक बड़ी चेतावनी है जिसने भाजपा के अभिमान और आत्मसंतुष्टि को हिलाने का काम किया। वैसे तो संशोधन वाला विधेयक यथार्थपरक है, लेकिन भाजपा को विपक्ष के सामने यह बात अनिवार्य तौर पर साफ करनी चाहिए कि वह भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधनों से पीछे नहीं हटेगी।
        2013 में बनाए गए खराब भूमि अधिग्रहण कानून में यह संशोधन इसलिए भी आवश्यक हैं ताकि इसके मुख्य आर्थिक लक्ष्य को हासिल किया जा सके। इससे बुनियादी ढांचे संबंधी बाधाओं को दूर किया जा सकेगा और विनिर्माण तथा आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही मोदी सरकार को गरीब किसानों के एक बड़े समूह को इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों से मुकाबले की प्रतिबद्धता दिखानी होगी। किसान इस समय अपनी जमीन से मिलने वाले कम लाभ, मौसमी कृषि श्रमिकों को कम भुगतान तथा मनरेगा पर निर्भरता के चलते मुश्किल से अपना जीवन निर्वाह कर पाने की स्थिति में हैं।

 भाजपा को अवश्य ही लोगों को स्पष्ट करना चाहिए कि भूमि अधिग्रहण कानून ग्रामीण आबादी के लिए चिंता का विषय नहीं बनेगा, क्योंकि आखिरकार उसे भी अपने क्षेत्र में उद्योगीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास का लाभ मिलेगा। लोगों को यह बताए जाने की जरूरत है कि भूमि अधिग्रहण के बजाय भारतीय कृषि के लिए कुछ अन्य मुद्दे अधिक चिंताजनक हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि भूमि अधिग्रहण से बमुश्किल 10 फीसद किसान ही प्रभावित होंगे जिनके पास शहरी क्षेत्रों के आसपास वाले इलाकों में बड़े आकार वाले भूखंड हैं।
शेष 90 फीसद किसान खराब फसल उत्पादन, बाजार तक पहुंच की सुविधा के अभाव, मूल्यों में अस्थिरता, कम मजदूरी, अस्थिर मौसमी रोजगार और व्यापक बुनियादी और शैक्षिक सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन से इन सभी कमजोर किसानों को लाभ होगा।
यह भाजपा और उसके सहयोगी दलों पर निर्भर करता है कि वे इस घटनाक्रम को ग्रामीण क्षेत्र के हित में पेश करें और आर्थिक विकास के समर्थन में गरीब किसानों को अपने पक्ष में करें। इस तरह अवसरवादी राजनीतिक नेताओं द्वारा लोगों को बरगलाने से निजात पाई जा सकेगी। भारतीय किसान सदैव राष्ट्रवादी रहे हैं। निश्चित ही वे विकास के लिए ईमानदार प्रयासों का पूरे दिल से समर्थन करेंगे। वे इसमें अपनी सहभागिता चाहेंगे, न कि राजनीति का एक मोहरा बनना। उन्हें संगठित करने के प्रयासों से न केवल इसे आर्थिक मुद्दा बनाया जा सकेगा, बल्कि नैतिक स्तर पर लोगों के मौलिक अधिकारों की चिंताओं का भी समाधान किया जाना संभव होगा। यह एक कठिन कार्य है, लेकिन इसे छोड़ा भी नहीं जा सकता।

 भाजपा को चाहिए कि वह सदस्यता अभियान के तहत बनाए गए अपने छह करोड़ नए पार्टी सदस्यों से इस बारे में बात करे और उनके विचारों को जाने। संभवत: यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक आंदोलन है जिसमें वे लंबे समय के लिए भाग लेंगे। जमीन का मामला सदैव ही भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दा बना रहेगा। हालांकि इसका कुछ हद तक गैर राजनीतिकरण किया जा सकता है। पहले कदम के तौर पर किसानों को समझाना होगा कि सरकार नहीं चाहेगी कि व्यापक राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में उनके साथ संघर्ष हो।
 बुनियादी ढांचे के तीव्र और टिकाऊ विकास से अंतत: वे भी लाभान्वित होंगे। दूसरी बात, किसानों को आश्वस्त करें कि उन्हें क्षतिपूर्ति का लाभ मिलेगा और आजीविका प्रभावित होने पर रोजगार देने के वादे पर ईमानदारी से अमल होगा। तीसरी बात, प्रधानमंत्री खुद इस बारे में किसानों को आश्वस्त करें।
चौथी बात, सरकार जिला प्रशासन के माध्यम से कम से कम समय में सरकारी जमीन तथा जिले में स्थित सार्वजनिक इकाइयों की सूची तैयार करे। नई परियोजनाओं को अतिरिक्त पड़ी सरकारी भूमि पर ही लगाया जाए। पांचवीं बात यह कि राच्य सरकारें शहरी क्षेत्रों में खाली पड़ी जमीनों की जानकारी दें और बहुउद्देश्यीय उपयोग की छूट दें। यह भी सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी अधिग्रहण बाजार दर से कम पर नहीं होगा। इससे तमाम भ्रष्टाचार पर रोक लग सकेगी। भारत में अनिवार्य रूप से भूमि बाजार का विकास होना चाहिए। इस काम के लिए संभवत: यह बिल्कुल सही समय है। भाजपा को चाहिए कि वह इस चुनौती को स्वीकार करे और किसी भी तरह अवसरवादी राजनीतिक विपक्ष के षड्यंत्रों का शिकार न हो।

[लेखक राजीव कुमार, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फेलो हैं]



गरीबी की राजनीति

22-3-2015


दिल्ली विधानसभा चुनावों के चौंकाने वाले परिणामों ने भारत में गरीबी की राजनीति को एक नई दिशा दी है। शायद यही वजह रही कि 2015-16 के आम बजट के बाद प्रत्येक विपक्षी दल ने भारतीय जनता पार्टी को गरीब और किसान विरोधी यानी अमीरों की पार्टी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बीते साल हुए लोकसभा चुनावों में सूपड़ा साफ होने के बाद अनिश्चितता से भरे राजनीतिक भविष्य को निहार रहे उत्तार प्रदेश और बिहार के क्षेत्रीय दलों को दिल्ली के चुनाव के बाद गरीबी की राजनीति में आशा की नई किरण दिखी है। भाजपा को अमीर समर्थक पार्टी बताकर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जदयू और राजद सभी इस नव वामपंथी विचारधारा के झंडाबरदार बन रहे हैं। लेकिन जिस आम आदमी पार्टी की सफलता को आधार मानकर ये दल इस रास्ते चलने की कोशिश कर रहे हैं वह रणनीति क्या उत्तार प्रदेश और बिहार में कारगर साबित होगी? भारत में समय के साथ गरीब और गरीबी के बदलते स्वरूप पर गौर करें तो लगता नहीं है कि इन दलों की यह रणनीति अधिक प्रभावी होगी। तथ्यों पर जाएं तो अर्थशास्त्री बीएस मिन्हास ने 1960 में गरीबी की सीमा रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 59 फीसद होने का अनुमान लगाया था। देश की जनसंख्या के इतने बड़े हिस्से के गरीब होने के कारण राजनेताओं को गरीबी की राजनीति करने का अवसर मिल गया। शायद इसी का नतीजा था कि उस वक्त की पूरी राजनीति गरीब समर्थक नीतियों के आसपास टिकी और इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा देकर 1971 के आम चुनावों को जीता। देश में गरीबों की तेजी से घटती संख्या ने निश्चित रूप से विशुद्ध गरीबी की राजनीति की चुनावी मारक क्षमता को कम किया है।

यह भी सच है कि आजादी के बाद से गरीबों की इच्छा, आकांक्षा का स्वरूप काफी हद तक बदला है। हरित क्रांति और आर्थिक उदारीकरण के पहले तक गरीबों की इच्छा-आकांक्षा रोटी, कपड़ा और मकान तक सीमित थी। लेकिन देश के विकास के साथ शिक्षा और संचार के साधनों की पहुंच ने इन आकांक्षाओं में भारी बदलाव ला दिया है। यह दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों से भली-भांति समझा जा सकता है। योजना आयोग के अनुमान के मुताबिक 2011-12 में दिल्ली में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या मात्र 9.9 फीसद है। इसके बावजूद आम आदमी पार्टी ने अपना पूरा चुनावी एजेंडा गरीबों को लक्ष्य बनाकर लोक-लुभावन बनाए रखा, क्योंकि दिल्ली में मध्यम वर्ग का एक बड़ा तबका गरीबी की मनोदशा का शिकार है। दिल्ली के सामाजिक परिवेश में इस श्रेणी के लोगों की आकांक्षाएं उच्च-मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग की जीवन शैली से प्रभावित होती हैं। इसलिए दिल्ली में बीस-पच्चीस हजार रुपये मासिक कमाने वाला कोई भी परिवार खुद को मानसिक रूप से गरीबी की श्रेणी में ही रखता है और राजनीतिक दलों के ऐसे लोक-लुभावन वायदों से प्रभावित होता है, जो आप ने दिल्ली चुनाव में किए। वही दूसरी ओर उत्तार प्रदेश और बिहार में रहने वाले छोटे किसान और उद्यमी भी सामाजिक गौरव की वजह से दिल्लीवासियों की तर्ज पर गरीबी की मानसिकता में नहीं जीते इसलिए विशुद्ध गरीबी के नारे उन्हें तब तक प्रभावित नहीं करेंगे जब तक उनकी महत्वाकांक्षा को न संबोधित किया जाए। इसलिए सपा, बसपा, राजद और जदयू जैसे दलों को मुफ्त दवा, शिक्षा और आहार से आगे बढ़कर संपूर्ण विकास की दिशा में सोचना होगा।
1989 में मंडल राजनीति और 1992 के बाद देश में भाजपा के प्रसार में बढ़त होने तक कांग्रेस ब्राह्मण, दलित और अल्पसंख्यक गठबंधन के साथ गरीबी के नारे का पूरा राजनीतिक लाभ लेने में सफल रही। लेकिन मुलायम सिंह, मायावती, लालू यादव, नीतीश कुमार और कल्याण सिंह जैसे नेताओं के उभरने और सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रभाव में आने के बाद उत्तार भारत के हिंदी भाषी इलाकों की राजनीतिक संरचना में बदलाव आया। पिछले तीन दशकों में धर्म और जाति के आधार पर हुए ध्रुवीकरण ने चुनावी राजनीति का चेहरा बदल कर गरीबी और आर्थिक विभाजन की राजनीति की प्रासंगिकता को काफी सीमित कर दिया है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण वामपंथी दलों का तेजी से घटता जनाधार है। राजनीति की इस दौड़ में विपक्षी दलों ने भाजपा को गरीब और किसान विरोधी पार्टी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जबकि सच्चाई सबके सामने है कि 2014 लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों को सिर्फ जनता की आकांक्षाओं तक ही सीमित रखकर भारी सफलता पाई। यहां यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि मोदी के समक्ष देश का विकास पहली प्राथमिकता है। चूंकि भाजपा को केंद्र की सत्ता में रहते हुए हर साल किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव लड़ना है इसलिए मोदी सरकार भी जनता की आकांक्षाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती। यही वजह है कि बजट में एक संतुलित नजरिया रखते हुए वित्तामंत्री अरुण जेटली ने हर वर्ग का ध्यान रखा है। हालांकि इसके बावजूद विपक्ष इसे मोदी सरकार की अमीर समर्थक छवि के तौर पर प्रस्तुत कर रहा है। सबके लिए पेंशन के तौर पर सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा, बचत को प्रोत्साहन और छोटे उद्यमियों के लिए मुद्रा बैंक जैसे उपायों की घोषणा खासतौर पर मध्य और निम्न वर्ग को ध्यान में रखते हुए की गई है। संसद में भाषण और भाजपा सांसदों को दिए गए निर्देशों में मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दिनों में भाजपा ने विपक्ष के इन प्रहारों का डटकर जवाब देने और सरकार के आमजन को लाभ देने वाले प्रयासों के प्रचार का मन बना लिया है।
पिछले कुछ वषरें में भारतीय मतदाता ने चुनावी पंडितों को लगातार चौंकाया है। इसलिए उत्तार प्रदेश और बिहार के आगामी चुनावों में गरीबी की राजनीति कितनी सफल होगी, यह बताना अभी जल्दी होगा, परंतु इतना निश्चित है कि जन आकांक्षाएं और सामाजिक ध्रुवीकरण अभी भी इन राज्यों की चुनावी राजनीति का अभिन्न हिस्सा है।

पानी का बंटवारा
22-3-2015


पानी के बंटवारे पर हरियाणा का विवाद केवल पंजाब और राजस्थान से ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से भी है। हालांकि भौगोलिक कारणों से स्थितियां एकदम विपरीत भी है। हरियाणा के पानी का हिस्सा पंजाब दबाए बैठा है और दिल्ली का आरोप रहा है कि हरियाणा उसके हिस्से का पानी देने में हमेशा आनाकानी करता रहा है जिसके कारण राष्ट्रीय राजधानी के लोगों को जल संकट झेलना पड़ रहा है। नवीनतम घटनाक्रम के तहत अपर यमुना रिवर बोर्ड की बैठक में हरियाणा के मुख्यमंत्री ने दो टूक कह दिया है कि दिल्ली को उतना ही पानी दिया जाएगा जितना उसका हिस्सा बनता है। प्रदेश के लोगों के हक को मार कर पड़ौसी को पानी देना किसी स्तर पर व्यावहारिक नहीं है।

 दिल्ली के मुख्यमंत्री हरियाणा से अतिरिक्त पानी की अपेक्षा कर रहे हैं दोनों सीएम के बीच अभी वार्ताओं का सिलसिला चलने की संभावना है लेकिन मुख्य सवाल यह है कि यमुना के जल पर दिल्ली और हरियाणा का जितना हिस्सा नियत किया गया, क्या आज के संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता को परखा जा रहा है? क्या विविध कारण बता कर अतिरिक्त पानी के लिए दबाव बनाया जा सकता है? क्या इस दबाव का कोई कानूनी आधार बन सकता है? बात सीधी और स्पष्ट है कि दबाव की राजनीति का कोई असर या लाभ होने वाला नहीं।

हरियाणा अपने हिस्से का पानी मांगने के लिए पंजाब पर लगातार दबाव बनाता रहा लेकिन उसे मिला क्या? सुप्रीम कोर्ट से मुकदमा जीतने, केंद्र, पंजाब और हरियाणा में एक ही पार्टी की सरकार होने जैसे अधिकतम अनुकूल कारकों-कारणों-आधारों के बावजूद हरियाणा की उम्मीदों-अपेक्षाओं पर हमेशा पानी फिरता रहा। राजस्थान भी जब-तब आंखें तरेरता है। दिल्ली भी यदि दबाव बनाने की मुद्रा में दिखे तो जरूरी हो जाता है कि हरियाणा अपना पक्ष, दावा और हक मजबूत करने के लिए तार्किक, व्यावहारिक और न्यायिक मोर्चाबंदी करे। दिल्ली को उसके हिस्से का पानी देने में संकोच न किया जाए पर साथ ही यह भी देखना होगा कि इस आपूर्ति से स्वयं उसके हित प्रभावित न हों। दिल्ली में पानी की मांग लगातार बढ़ रही है और आपूर्ति के परंपरागत स्त्रोत सिकुड़ रहे हैं, स्वाभाविक है कि पानी के लिए हरियाणा से उसकी अपेक्षाएं बढ़ती जाएंगी। जल बंटवारे पर प्रदेश को अपनी नीति व नीयत स्पष्ट रखते हुए यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी तरह का दबाव प्रदेशवासियों के हितों को प्रभावित न कर पाए।