Mar 19, 2015

कूटनीति का महासागर

19-3-2015


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले सप्ताह सेशल्स, मॉरीशस और श्रीलंका की यात्रा पर रहे। ये तीनों ही हिंद महासागर में महत्वपूर्ण द्वीपीय देश हैं। यह भी कहा जा रहा था कि प्रधानमंत्री मालदीव की भी यात्रा पर जाएंगे, लेकिन यह कार्यक्रम बाद में टाल दिया गया, क्योंकि इस देश में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए पहले राष्ट्रपति और वर्तमान में विपक्ष के नेता मोहम्मद नशीद को भारत द्वारा नाराजगी जाहिर किए जाने के बाद भी गिरफ्तार कर लिया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी यात्रा के दौरान इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए सेशल्स, मॉरीशस और श्रीलंका को सैन्य और नागरिक सहयोग दिए जाने का संकेत दिया। चीन इन द्वीपीय देशों में न केवल हाईवे बनाने के साथ बिजली संयत्र लगाना चाहता है, बल्कि समुद्री बंदरगाह स्थापित करने की भी तमन्ना रखता है। चीन के इरादे को देखते हुए भारत हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा नेटवर्क मुहैया कराना चाहता है जिसके लिए वह इन देशों को गश्ती जहाज, निगरानी वाले राडार देने के साथ-साथ सी-मैपिंग की सुविधा भी मुहैया कराने को तत्पर है।
भारतीय प्रधानमंत्री का अपने समुद्री पड़ोसी देशों की यात्रा किया जाना इस बात को प्रतिध्वनित करता है कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में इन देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करना चाहता है। यह क्षेत्र भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन नई दिल्ली का प्रभाव क्रमिक रूप से यहां कम होता गया। दक्षिण एशिया में चीन भारत को कड़ी चुनौती दे रहा है फिर चाहे वह कूटनीतिक रूप से हो अथर्वा ंहद महासागर में स्थित इन छोटे द्वीपीय देशों में अपनी उपस्थिति के माध्यम से। भारत के आसपास स्थित देशों से चीन अपनी घनिष्ठता बढ़ा रहा है, जिसमें श्रीलंका, सेशल्स और मॉरीशस शामिल हैं। चीन र्को ंहद महासागर में वर्ष 2012 में तब बड़ी सफलता मिली जब इस क्षेत्र में सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण देश सेशल्स ने अपने यहां चीनी सेना को मदद और अन्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए अड्डा बनाने की अनुमति दी। हालांकि बीजिंग ने ऐसी किसी भी बात से इन्कार किया है। सेशल्स से चीन को मिला प्रस्ताव इस क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन को दर्शाता है, जिसे कमतर नहीं आंका जा सकता। भारत परंपरागत रूप से सेशल्स को हथियार मुहैया कराने वाला मुख्य देश रहा है। इतना ही नहीं भारत सेशल्स के एसपीडीएफ या पीपुल्स डिफेंस फोर्सेज को हथियार देने के साथ ही उसे प्रशिक्षण भी देता रहा है।
वर्ष 2012 में भारत ने सेशल्स के साथ सामरिक रिश्तों को मजबूती देने के लिए उसे पांच करोड़ डॉलर का ऋण और करीब 2.5 करोड़ डॉलर की अनुदान राशि मुहैया कराई। भारतीय नौसेना चारों तरफ जल से घिरे इन द्वीपीय देशों का चक्कर लगाती रहती है। मोदी की यात्रा इस रूप में भी महत्वपूर्ण है कि 34 वर्ष बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री सेशल्स आया। मोदी की यात्रा के दौरान सेशेल्स के साथ चार समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें हाइड्रोग्राफी में सहयोग, नवीकरणीय ऊर्जा, बुनियादी ढांचे में विकास और नौपरिवहन तथा इलेक्ट्रॉनिक नौपरिवहन चार्ट की बिक्री शामिल है। सेशल्स के लिए एक और डोर्नियर एयरक्राफ्ट, तटीय निगरानी राडार परियोजना की घोषणा बढ़ते द्विपक्षीय सहयोग का प्रतीक है। मोदी ने इस बात पर भी बल दिया कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय समझौते आम लोगों के समान उद्देश्यों पर आधारित हैं, जिससे इस क्षेत्र में शांति और समृद्धि बढ़ेगी। मॉरीशस के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर भारतीय प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि थे। इस दौरान भारत से निर्यात किए गए युद्धपोत का जलावतरण किया गया। यह भारत में निर्मित एक गश्ती जहाज है, जिसकी क्षमता 1300 टन है। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा कि यहां रह रहे लोगों की यह प्राथमिक जवाबदेही है कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बरकरार रहे तथा समृद्धि बढ़े। इसके लिए उन्होंने भारत समेत दूसरे अन्य क्षेत्रीय देशों की बड़ी जिम्मेदारी पर बल दिया। मोदी ने यह भी कहा र्कि ंहद महासागर क्षेत्र में मजबूत शुरुआत का समय अब आ गया है और आने वाले वषरें में इस संदर्भ में अधिक उत्साह दिखेगा। नई दिल्ली की ओर से आने वाले वषरें में मॉरीशस को 13 और युद्धक जहाजों की आपूर्ति की जाएगी। मॉरीशस में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भारत ने उसे 50 करोड़ डॉलर आसान किश्तों पर कर्ज देने की बात कही है। दोनों देशों ने पांच समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें समुद्री अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए व्यापक सहयोग तथा हिंद महासागर में महत्वपूर्ण क्षेत्रों के टिकाऊ विकास पर ध्यान देने की बात कही गई है।
मोदी की श्रीलंका यात्रा भी ऐतिहासिक है, क्योंकि 28 साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री वहां गया। मोदी ने ऐसे समय में यात्रा की जब र्मंहदा राजपक्षे की हार के कारण श्रीलंका में चीन की बढ़ती उपस्थिति को धक्का पहुंचा है। इस वर्ष जनवरी माह में हुए राष्ट्रपति चुनावों में मैत्रीपाल सिरिसेना को जीत मिली। सिरिसेना सरकार ने खुले तौर पर यह इच्छा जताई कि वह राजपक्षे के शासनकाल में चीन के साथ हुए समझौतों पर नए सिरे से विचार करेंगे। उन्होंने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। नए राष्ट्रपति ने अपनी प्रथम विदेश यात्रा के तौर पर भारत का चुनाव किया और परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच नागरिक परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौता हुआ। सिरिसेना सरकार ने इस बात को भी रेखांकित किया कि वह पूर्व राजपक्षे सरकार द्वारा सितंबर 2014 में कोलंबो समुद्री बंदरगाह पर चीनी पनडुब्बी को रुकने संबंधी अनुमति पर पुनर्विचार करेगी, क्योंकि इस पर भारत ने अपनी चिंता जताई थी। इस दिशा में कूटनीतिक जोखिम उठाते हुए भी श्रीलंका ने कोलंबो में चीन द्वारा बनाई जाने वाले 1.5 अरब डॉलर की रियल इस्टेट परियोजना को रद कर दिया। यह श्रीलंका के बंदरगाह और बुनियादी ढांचों के विकास में सबसे बड़ा चीनी निवेश था। श्रीलंका सरकार ने इन समझौतों में पारदर्शिता का अभाव होने के साथ-साथ पर्यावरण मानकों पर खरा न उतरने की बात कही। मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने चार समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें राजनयिक पासपोर्ट रखने वालों को वीजा अनुमति से छूट, पारस्परिक कस्टम सहयोग में इजाफा, युवाओं से संबंधित समझौता और रवींद्रनाथ टैगोर को समर्पित म्यूजियम का निर्माण शामिल है।
भारत ने श्रीलंका के रेलवे क्षेत्र को 38 करोड़ डॉलर की वित्तीय मदद का प्रस्ताव दिया। भारत ने त्रिंकोमाली को पेट्रोलियम केंद्र के तौर विकसित करने का वादा किया जो सामरिक भंडारण की दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा। मोदी युद्ध से प्रभावित क्षेत्र जाफना भी गए और वहां भारतीय मदद से तैयार किए गए घरों को सौंपा। कुल मिलाकर भारत ने चीन सिल्क मार्ग परियोजना की चुनौती के मद्देनजर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। मोदी की यात्रा एक अच्छी शुरुआत है।
[लेखक हर्ष वी. पंत, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ हैं]

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